पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव, वर्ना पैसा मांगते वक्त भारत का पक्ष मजबूत होता
भारत दुनिया का सबसे विशाल भूजल निगरानी नेटवर्क संचालित करता है. केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) 1969 से 23,000 कुओं के ज़रिए जलस्तर को ट्रैक कर रहा है. इसके बावजूद, राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना के तहत लगभग 25,000 में से केवल 5,260 स्टेशनों को ही टेलीमेट्री युक्त 'डिजिटल वाटर लेवल रिकॉर्डर' दिए जा रहे हैं. अंकित मिश्रा के अनुसार, अधिकांश आंकड़े आज भी हाथों से मापे जाते हैं. डिजिटल भुगतान और कर संग्रह में वैश्विक मिसाल पेश करने वाले भारत के पास क्षमता होते हुए भी पर्यावरण डेटा को रियल-टाइम करने की प्राथमिकता का अभाव है.
यह उदासीनता अन्य पर्यावरणीय क्षेत्रों में भी साफ़ झलकती है:
आर्द्रभूमि में देरी: भारत का आर्द्रभूमि मानचित्र वर्षों तक पुराने उपग्रह चित्रों पर निर्भर रहा. 2024 में 2018-19 के चित्रों के आधार पर क्षेत्रफल 16.89 मिलियन हेक्टेयर बताया गया. किसी नियमित वैधानिक सर्वेक्षण चक्र के बिना वर्षों का यह अंतर जल संसाधनों के प्रबंधन में बड़ी बाधा है.
वनीकरण और कागज़ी दावे: 2014 से 2024 के बीच 1.73 लाख हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन उपयोग के लिए दी गई. इसके बदले क्षतिपूरक वनीकरण (सीएएमपीए) होना था. हालांकि, मध्य प्रदेश के सागर में 2023 के कैग (सीएजी) ऑडिट में पाया गया कि रिकॉर्ड में दर्ज 1.66 लाख पौधों में से ज़मीन पर 46,364 पौधे नदारद थे.
सत्यापन की कमी: भारत ने परिवेश पोर्टल और भूजल-मूल्यांकन प्लेटफॉर्म आईएन-जीआरईएस में निवेश किया है, लेकिन डेटा के नियमित अपडेट चक्र और स्वतंत्र सत्यापन में नहीं. व्यवस्था मौजूद है, लेकिन उसे पूरी क्षमता से संचालित नहीं किया जा रहा.
आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व
पर्यावरणीय आंकड़ों का गहरा आर्थिक असर होता है. वन मंजूरियां हजारों करोड़ों की परियोजनाओं का रास्ता खोलती हैं, वहीं उत्तर भारत में भूजल क्षरण खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है. बेलेम में COP30 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन) के दौरान विकसित देशों से ‘अनुकूलन वित्त’ मांगते समय भारत का पक्ष और मजबूत होता यदि उसके पास वनों और भूजल का रियल-टाइम प्रामाणिक डेटा होता.
इसके लिए किसी नए मंत्रालय की आवश्यकता नहीं है, केवल वित्त मंत्रालय की तर्ज पर दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए. मसलन, केंद्रीय भू-जल बोर्ड के हर कुएं को टेलीमेट्री से जोड़ने की समय-सीमा तय हो, आर्द्रभूमि सूची को हर पांच साल में अपडेट किया जाए और सीएएमपीए के रिकॉर्ड को सार्वजनिक ऑडिट के लिए पारदर्शी बनाया जाए.
लेखक का मानना हाई कि भारत डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को अनिवार्य मानकर डिजिटल गवर्नेंस में अग्रणी बना है. पर्यावरण मंत्रालय को भी समय-बद्ध जवाबदेही तय करनी होगी, क्योंकि जिस संसाधन को आप सही ढंग से मापते नहीं, उसका प्रबंधन संभव नहीं है.

