अगस्त में अनिश्चितकाल के लिए स्थगित, लेकिन एक माह बाद भी सत्रावसान नहीं; जानिए देरी के मायने और विपक्ष के सवाल

13 अगस्त को संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित  कर दिया गया था, लेकिन इसके एक महीने बाद भी दोनों सदनों का सत्रावसान नहीं हुआ है. सत्रावसान वह आधिकारिक प्रक्रिया है जो किसी संसदीय सत्र का औपचारिक अंत करती है. संवैधानिक रूप से सत्रावसान का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, लेकिन इस असामान्य विलंब ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विवाद को जन्म दे दिया है.

विपक्ष का आरोप है कि सरकार विवादास्पद ‘लोकसभा विस्तार-आधारित परिसीमन विधेयक’ को दोबारा पेश करने की फिराक में है. महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 करने से जुड़े इस संविधान संशोधन विधेयक को अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में संयुक्त विपक्ष ने खारिज कर दिया था. यह पहला मौका था जब मोदी सरकार कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने में विफल रही थी.

‘द वायर’ के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 85(1) के अनुसार, राष्ट्रपति संसद के सदनों को आहूत करते हैं और दो सत्रों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए. वहीं अनुच्छेद 85(2) राष्ट्रपति को सत्रावसान और लोकसभा भंग करने का अधिकार देता है. हालांकि, संविधान में स्थगन के बाद सत्रावसान की कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं है.

लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी के अनुसार, सामान्यतः अनिश्चितकाल के लिए स्थगन के एक सप्ताह के भीतर सत्रावसान कर दिया जाता है. स्थगन सत्र के भीतर केवल एक विराम है, जबकि सत्रावसान सत्र का पूरा समापन है.

राज्यसभा एट वर्क’ मैनुअल के अनुसार, यदि सत्रावसान से पहले सदन को पुनः बुलाया जाता है, तो उसे अलग सत्र न मानकर उसी सत्र का 'दूसरा भाग' माना जाता है. इसके लिए सांसदों को नया समन जारी करने की आवश्यकता नहीं होती. ऐसा पूर्व में 1989, 2003, 2008 और 2013 में भी हो चुका है.

सत्रावसान में देरी का रणनीतिक और कानूनी गणित

यदि सदनों का सत्रावसान नहीं होता है, तो सरकार के सामने दो मुख्य कानूनी स्थिति बनती हैं: एक- अध्यादेश पर रोक. अनुच्छेद 123 के तहत सरकार केवल तभी अध्यादेश ला सकती है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों. चूंकि तकनीकी रूप से सत्र अभी समाप्त नहीं हुआ है, इसलिए सरकार अध्यादेश जारी नहीं कर सकती. दूसरा- संविधान संशोधन की मजबूरी. परिसीमन विधेयक एक संवैधानिक संशोधन है, जिसे अनुच्छेद 368 के तहत केवल संसद में विधेयक लाकर ही पारित किया जा सकता है. इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है.

उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) में हालिया टूट-फूट के बाद भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के आंकड़े मजबूत हुए हैं. कांग्रेस नेता जयराम रमेश का आरोप है कि सरकार 2015 के मानसून सत्र की तरह रणनीति अपना रही है (जब जीएसटी बिल पास कराने के लिए सत्रावसान में 28 दिनों की देरी की गई थी).

जयराम रमेश और टीएमसी सांसद सागरिका घोष का दावा है कि गृह मंत्री परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. विपक्ष के अनुसार, जब तक सरकार आवश्यक आंकड़े नहीं जुटा लेती, तब तक सत्र को तकनीकी रूप से जीवित रखा जा रहा है.

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