भारत का चुनाव आयोग अपनी साख क्यों खो रहा है? सुकुमार सेन से ज्ञानेश कुमार तक एक आलोचनात्मक आकलन

‘काउंटरकरंट्स’ में डॉ. सैयद मोहम्मद रागिब ने लिखा है कि भारत का निर्वाचन आयोग (ईसीआई) अपनी विश्वसनीयता को लेकर बढ़ते सवालों का सामना कर रहा है. 14 अक्टूबर 2026 को ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाए जाने और इसके विरोध में सड़कों पर उतरे मतदाताओं का मुद्दा उठाया गया. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित चुनाव आयोग संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निगरानी करता है. लोकतंत्र में उसकी भूमिका केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम रखना भी है कि चुनाव निष्पक्ष, पारदर्शी और बिना पक्षपात के हो रहे हैं.

1. सुकुमार सेन से आधुनिक चुनाव आयोग तक

भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने 1951-52 में पहला आम चुनाव कराया था. उस समय देश में लगभग 17.32 करोड़ मतदाता थे, लोकसभा की 489 सीटों पर चुनाव हुआ और करीब 1.96 लाख मतदान केंद्र बनाए गए. व्यापक निरक्षरता, सीमित परिवहन और सामाजिक असमानताओं के बावजूद यह एक बड़ी उपलब्धि थी. सेन ने साबित किया कि लोकतांत्रिक भागीदारी को शिक्षा, जाति, संपत्ति या सामाजिक स्थिति के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए.

1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एन. शेषन ने आदर्श आचार संहिता लागू कराने, चुनावी खर्च की निगरानी और चुनावी अनियमितताओं पर कार्रवाई के लिए आयोग को अधिक सक्रिय बनाया. हालांकि, अलग-अलग दौर के चुनाव आयुक्तों की तुलना करते समय राजनीतिक, कानूनी और तकनीकी परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है. मूल सवाल यह है कि क्या आयोग की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही आज भी जनता का भरोसा बनाए रखने में सक्षम हैं.

2. चुनावी विस्तार: एक असाधारण प्रशासनिक उपलब्धि

भारत में मतदाताओं की संख्या पहले आम चुनाव के लगभग 17.32 करोड़ से बढ़कर 2014 में 83.4 करोड़ और 2024 में करीब 97.98 करोड़ हो गई. 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 65.79 प्रतिशत मतदान हुआ. करीब दस लाख मतदान केंद्रों और लाखों चुनावकर्मियों की भागीदारी वाला यह आयोजन आयोग की विशाल प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है.

लेकिन बड़े पैमाने पर चुनाव करा लेना और चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखना अलग-अलग बातें हैं. मतदाता सूची की शुद्धता, चुनावी खर्च, प्रचार में समान अवसर और नियमों के निष्पक्ष क्रियान्वयन पर उठने वाले सवालों का जवाब देना भी जरूरी है. इसलिए आयोग के प्रदर्शन का आकलन केवल चुनावों के सफल आयोजन से नहीं किया जा सकता.

3. ज्ञानेश कुमार और संस्थागत स्वतंत्रता का सवाल

ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला. केरल कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी कुमार केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय और संसदीय कार्य मंत्रालय सहित कई वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में नेता विपक्ष शामिल हैं. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था में भारत के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका थी. आलोचकों का तर्क है कि नई व्यवस्था में केंद्र सरकार का प्रभाव बढ़ता है, जबकि आयोग को सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के साथ समान व्यवहार करना चाहिए. समर्थकों का कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की भागीदारी लोकतांत्रिक रूप से उचित है.

यह विवाद किसी व्यक्ति के अनुचित आचरण का प्रमाण नहीं है. सवाल यह है कि क्या नियुक्ति प्रक्रिया आयोग की स्वतंत्रता के प्रति पर्याप्त भरोसा पैदा करती है और कार्यपालिका के प्रभाव से बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.

4. विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदान का अधिकार

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) आयोग के सामने सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक है. आयोग का कहना है कि मृत मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों और गलत रिकॉर्ड को हटाना जरूरी है. लेकिन पुनरीक्षण की प्रक्रिया और उसमें नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 में बिहार से शुरू हुई और बाद में अन्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों तक विस्तारित प्रक्रिया के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की खबर सामने आई. यह आंकड़ा हटाए गए नामों का है. इससे यह साबित नहीं होता कि सभी नाम पात्र मतदाताओं के थे या सभी को अवैध रूप से मतदान के अधिकार से वंचित किया गया.

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी. हालांकि, इसके क्रियान्वयन पर अलग सवाल उठे. अक्टूबर 2026 में अदालत ने ज्ञानेश कुमार को अंतरिम रूप से हटाने की मांग पर तत्काल आदेश देने से इनकार करते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा. आरोपों का निष्कर्ष साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए.

प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और दस्तावेज जुटाने में कठिनाई का सामना करने वाले नागरिकों के लिए सत्यापन की प्रक्रिया विशेष रूप से मुश्किल हो सकती है. इसलिए आयोग को नाम जोड़ने, हटाने, आपत्तियों और बहाली का स्पष्ट रिकॉर्ड प्रकाशित करना चाहिए तथा अपील की सुलभ व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए.

5. सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर विवाद

सितंबर 2026 में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने रिपोर्ट किया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े फैसलों पर कई बार आपत्ति दर्ज की थी. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग दस महीने में कम से कम 14 आपत्तियां सामने आईं. आयोग ने इन मतभेदों की व्याख्या से जुड़े कुछ पहलुओं पर असहमति जताई.

आयुक्तों के बीच मतभेद होना अपने आप में संस्थागत विफलता नहीं है. महत्वपूर्ण सवाल यह हैं कि क्या निर्णय लेते समय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन हुआ, क्या असहमतियों को उचित रूप से दर्ज किया गया और क्या फैसलों की जानकारी जनता को सही तरीके से दी गई. इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और स्वतंत्र जांच से मिलना चाहिए.

6. आदर्श आचार संहिता और चुनावी असमानता

आदर्श आचार संहिता का उद्देश्य सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और चुनावी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को रोकना है. विपक्षी दलों ने कई बार आरोप लगाया है कि आयोग शिकायतों पर समान रूप से कार्रवाई नहीं करता. हालांकि, केवल राजनीतिक आरोपों से पक्षपात साबित नहीं होता. इसके लिए शिकायतों, साक्ष्यों, आदेशों और कार्रवाई में लगे समय की तुलना जरूरी है.

आयोग शिकायतों और उनके परिणामों का सार्वजनिक रिकॉर्ड जारी करके भरोसा बढ़ा सकता है. राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता भी महत्वपूर्ण है. फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया. हालांकि, राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता की जिम्मेदारी केवल आयोग की नहीं है, लेकिन चुनावी जवाबदेही में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहती है.

7. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें और सार्वजनिक भरोसा

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) ने मतदान और मतगणना को अधिक व्यवस्थित बनाया है, लेकिन उनकी विश्वसनीयता पर विवाद जारी हैं. राजनीतिक संदेह अपने आप में चुनावी हेरफेर का प्रमाण नहीं है. फिर भी, आयोग को तकनीकी सुरक्षा, सत्यापन और शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए.

मई 2024 में मतदान के आंकड़ों को लेकर बहस के बाद आयोग ने प्रत्येक संसदीय क्षेत्र में मतदाताओं की कुल संख्या सहित मतदान संबंधी जानकारी प्रकाशित करने की बात कही थी. यह दिखाता है कि सार्वजनिक निगरानी और सवालों का जवाब देने से पारदर्शिता मजबूत हो सकती है. मतदाता सूची और मतदान केंद्रों के रिकॉर्ड के मामले में भी ऐसी ही स्पष्टता जरूरी है.

8. जनता का भरोसा बहाल करने के लिए सुधार

आयोग की विश्वसनीयता मजबूत करने के लिए पांच सुधार महत्वपूर्ण हैं: नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और चयन के मानदंड सार्वजनिक करना; मतदाता सूची में जोड़े गए तथा हटाए गए नामों का विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध कराना; सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और असहमतियों का उचित दस्तावेजीकरण करना; आचार संहिता की शिकायतों के समयबद्ध निपटारे की व्यवस्था बनाना; और तकनीकी ऑडिट, शिकायत निवारण तथा न्यायिक समीक्षा को मजबूत करना.

ये कदम वास्तविक प्रशासनिक समस्याओं और राजनीतिक आरोपों के बीच अंतर स्पष्ट करने में मदद करेंगे.

निष्कर्ष: प्रशासनिक अधिकार से लोकतांत्रिक वैधता तक

सुकुमार सेन से ज्ञानेश कुमार तक चुनाव आयोग की यात्रा भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धियों और चुनौतियों, दोनों को दर्शाती है. आज आयोग लगभग 98 करोड़ मतदाताओं वाली विशाल व्यवस्था संचालित करता है, लेकिन प्रशासनिक क्षमता ही उसकी विश्वसनीयता की एकमात्र कसौटी नहीं है. नियुक्ति प्रक्रिया, एसआईआर, आंतरिक निर्णयों और आचार संहिता के क्रियान्वयन पर उठे सवाल यह साबित नहीं करते कि हर आरोप सही है, लेकिन वे पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत जरूर दिखाते हैं.

सुकुमार सेन की विरासत केवल पहला आम चुनाव सफलतापूर्वक कराना नहीं थी, बल्कि सार्वभौमिक मताधिकार को व्यवहार में उतारना भी थी. आज आयोग के सामने चुनौती इस उपलब्धि को अधिक जटिल राजनीतिक और तकनीकी परिस्थितियों में सुरक्षित रखने की है. अनुच्छेद 324 आयोग को संवैधानिक अधिकार देता है, लेकिन उसकी लोकतांत्रिक वैधता इस भरोसे पर निर्भर करती है कि हर पात्र नागरिक को मतदान का अवसर मिले, सभी राजनीतिक दलों पर समान नियम लागू हों और हर निर्णय स्वतंत्र जांच की कसौटी पर खरा उतरे. आयोग की साख आलोचना से बचने में नहीं, बल्कि सवालों का पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से सामना करने में है.


(यह हिंदी में अनूदित सारांश है. डॉ. सैयद मोहम्मद रागिब की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है)

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