भारत में माइसेटोमा के 49 मामले दर्ज, कितने मरीज छूट गए? खेतों में नंगे पैर काम करने वाले मजदूर जूझ रहे ऐसी बीमारी से, जिस पर किसी की नजर नहीं

‘आर्टिकल-14’ में रितुपर्णा पालित ने लिखा है कि भारत में माइसेटोमा नामक गंभीर संक्रमण के मामलों की वास्तविक संख्या का पता नहीं है. जनवरी 2023 से भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के निगरानी नेटवर्क में इसके फंगल रूप के केवल 49 मामले दर्ज हुए हैं. यह आंकड़ा देश में बीमारी के कुल प्रसार का अनुमान नहीं है. मुख्य रूप से किसानों और खेतिहर मजदूरों को प्रभावित करने वाली इस बीमारी की पहचान में देरी, इलाज का खर्च और आजीविका छिनने का डर मरीजों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं.

माइसेटोमा मिट्टी में मौजूद फंगस या बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है. कांटा चुभने या त्वचा पर छोटा घाव होने के बाद रोगाणु शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और धीरे-धीरे त्वचा, मांसपेशियों तथा हड्डियों को नुकसान पहुंचाते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2016 में इसे उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारियों की सूची में शामिल किया था. शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूकता की कमी और जांच की सीमित सुविधाओं के कारण कई मरीजों का वर्षों तक सही निदान नहीं हो पाता.

नौ साल के इलाज के बाद गंवाना पड़ा पैर

तमिलनाडु के 28 वर्षीय एम. रविचंद्रन को 12 साल की उम्र में खेत में काम करते समय बबूल का कांटा पैर में चुभ गया था. कुछ ही हफ्तों में पैर सूजने लगा और उसमें घाव बनने लगे. बाद में जांच में माइसेटोमा की पुष्टि हुई. अगले नौ वर्षों में उन्होंने कई ऑपरेशन कराए, लेकिन संक्रमण बार-बार लौटता रहा. आखिरकार 21 साल की उम्र में उनका पैर काटना पड़ा.

इलाज के दौरान रविचंद्रन को स्कूल छोड़ना पड़ा और उनके परिवार ने लगभग छह लाख रुपये खर्च किए, जिसमें बड़ी रकम साहूकारों से उधार ली गई थी. अब कृत्रिम पैर के सहारे वे श्रीपेरंबदूर की एक मोबाइल निर्माण इकाई में काम करते हैं और परिवार के खेत में भी हाथ बंटाते हैं. उनके कृत्रिम पैर पर करीब 80 हजार रुपये खर्च हुए. वर्षों के इलाज के बाद भी उन पर लगभग तीन लाख रुपये का कर्ज बाकी है.

बीमारी की वास्तविक तस्वीर अधूरी

आईसीएमआर ने सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में बताया कि उसके माइकोनेट नेटवर्क ने जनवरी 2023 से फंगल माइसेटोमा के 49 मामले दर्ज किए हैं. हालांकि, परिषद ने स्पष्ट किया कि यह जनसंख्या आधारित आंकड़ा नहीं है और इससे देश में बीमारी के कुल मामलों का पता नहीं चलता. मरीजों के आगे के इलाज और बीमारी की पुनरावृत्ति से संबंधित जानकारी भी रजिस्टर में दर्ज नहीं की गई.

विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल व्यवस्था मुख्य रूप से उन मरीजों के आंकड़े जुटाती है, जो बड़े अस्पतालों तक पहुंचते हैं. बीमारी का वास्तविक प्रसार समझने के लिए गांवों और प्रभावित इलाकों में सक्रिय निगरानी तथा सर्वेक्षण जरूरी हैं. वर्ष 2013 की एक समीक्षा में भारत के 1,392 प्रकाशित मामलों का उल्लेख था, जबकि 2024 की एक समीक्षा में भी भारत को फंगल माइसेटोमा के अधिक मामले दर्ज करने वाले देशों में शामिल किया गया था.

आजीविका खोने का डर और इलाज में देरी

राजस्थान के जोधपुर जिले के 58 वर्षीय खेतिहर मजदूर अचला राम लगभग 16 वर्षों तक घाव के साथ रहे. उन्हें डर था कि डॉक्टर ऑपरेशन करेंगे और वे काम नहीं कर पाएंगे. जब वे विशेषज्ञ अस्पताल पहुंचे, तब तक बीमारी गंभीर हो चुकी थी. इससे पहले वे निजी अस्पतालों में गलत निदान और दवाओं पर दो से तीन लाख रुपये खर्च कर चुके थे.

राम को तीन ऑपरेशन कराने पड़े, लेकिन घाव और मवाद निकलने की समस्या दोबारा होने लगी. इलाज के लिए उन्हें हर महीने लगभग 140 किलोमीटर की यात्रा करके जोधपुर जाना पड़ता है. कई बार सरकारी योजनाओं के तहत दवाएं और ऑपरेशन मुफ्त मिले, लेकिन दवाओं का स्टॉक उपलब्ध न होने पर उन्हें निजी दुकानों से दवाएं खरीदनी पड़ीं. उनकी आय बंद हो गई है और परिवार को रोजमर्रा के खर्चों के लिए रिश्तेदारों से उधार लेना पड़ता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी मरीजों के साथ-साथ डॉक्टरों के बीच भी मौजूद है. कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में माइक्रोस्कोपी, फंगल कल्चर और अन्य विशेष जांच की सुविधाएं नहीं हैं. मरीज अक्सर स्थानीय उपचार या एंटीबायोटिक लेते रहते हैं, जबकि बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाती.

संक्रमण के अलग रूप, अलग इलाज

माइसेटोमा के दो प्रमुख रूप हैं. एक्टिनोमाइसेटोमा बैक्टीरिया से होता है और आम तौर पर एंटीबायोटिक से इसका इलाज संभव है. इसके विपरीत, फंगल माइसेटोमा का इलाज अधिक कठिन होता है. फंगस के चारों ओर बनने वाली संरचनाएं दवाओं को संक्रमण तक पहुंचने से रोक सकती हैं. ऐसे मामलों में दवाओं से पहले या उनके साथ संक्रमित ऊतक हटाने के लिए सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है. बीमारी का इलाज न होने पर स्थायी शारीरिक विकलांगता हो सकती है.

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की 23 वर्षीय तरुणा राठिया का मामला बताता है कि सही निदान मिलने पर इलाज सफल हो सकता है. बचपन में उनकी पीठ पर छोटे उभार बने थे, जो बाद में घाव और मवाद में बदल गए. कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान इलाज में और देरी हुई. 2022 में एम्स रायपुर में एक्टिनोमाइसेटोमा की पुष्टि के बाद लक्षित इलाज शुरू हुआ और छह महीने के भीतर घाव भरने लगे. हालांकि, इलाज के लिए उन्हें पढ़ाई का एक साल गंवाना पड़ा.

आर्थिक बोझ और सामाजिक अलगाव

मरीजों के लिए अस्पताल तक पहुंचना भी महंगा पड़ता है. यात्रा, काम से छुट्टी, दवाएं और लंबे इलाज का खर्च परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर कर देते हैं. माइसेटोमा के मरीजों को विकलांगता के कारण रोजगार पाने में भी कठिनाई होती है. रविचंद्रन के मुताबिक, पैर कटने के बाद समाज का व्यवहार बदल गया और उन्हें नौकरी पाने के लिए किसी की सिफारिश की जरूरत पड़ी.

जोधपुर में अचला राम को जांच का परिणाम सकारात्मक आने के बाद अस्पताल कर्मचारियों ने मास्क पहनने को कहा. उन्हें लगा कि बीमारी छूने से फैलती है, इसलिए उन्होंने परिवार के साथ खाना खाना तक बंद कर दिया. बाद में वरिष्ठ डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि माइसेटोमा सामान्य मानवीय संपर्क से नहीं फैलता. यह घटना बीमारी के बारे में स्वास्थ्यकर्मियों के बीच भी सही जानकारी की जरूरत दिखाती है.

निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत

विशेषज्ञों का सुझाव है कि माइसेटोमा को अधिसूचित बीमारी बनाया जाए, ताकि अस्पतालों और प्रयोगशालाओं के लिए इसके मामलों की सूचना स्वास्थ्य अधिकारियों को देना अनिवार्य हो. इससे बीमारी के प्रसार, इलाज और दोबारा संक्रमण के मामलों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार हो सकेगा. फिलहाल सूडान एकमात्र ऐसा देश है, जहां माइसेटोमा के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था मौजूद है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों का मानना है कि कुष्ठ रोग और अन्य उपेक्षित बीमारियों की तरह सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों को शुरुआती लक्षण पहचानने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है. आईसीएमआर का माइकोनेट नेटवर्क इस दिशा में एक शुरुआती कदम है, लेकिन इसे व्यापक निगरानी और मरीजों के नियमित फॉलो-अप से जोड़ना जरूरी है.

माइसेटोमा की चुनौती केवल एक संक्रमण का इलाज करने तक सीमित नहीं है. समय पर पहचान, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में जांच सुविधाएं, नियमित दवाओं की उपलब्धता और मरीजों की आर्थिक सहायता के बिना कई लोग बीमारी के साथ वर्षों तक जीने को मजबूर रहेंगे. बीमारी की वास्तविक संख्या जानने और मरीजों को समय पर उपचार देने के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था को अस्पतालों तक पहुंचने वाले मामलों से आगे बढ़कर गांवों में सक्रिय रूप से मरीजों की पहचान करनी होगी.

Previous
Previous

‘खुद को कानून से ऊपर मानकर कर रहे हैं काम’: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी पुलिस को लगाई फटकार

Next
Next

भारत का चुनाव आयोग अपनी साख क्यों खो रहा है? सुकुमार सेन से ज्ञानेश कुमार तक एक आलोचनात्मक आकलन