ई.ए.एस. शर्मा | चुनाव आयोग एसआईआर रोके, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव रद्द करे  

‘काउंटरकरंट्स’ में भारत सरकार के पूर्व सचिव ई.ए.एस. शर्मा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को लिखे पत्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने चुनाव आयोग से देशभर में चल रही एसआईआर प्रक्रिया रद्द करने, पश्चिम बंगाल में इसी प्रक्रिया के आधार पर कराए गए विधानसभा चुनावों को अमान्य घोषित करने और चुनावी आंकड़ों के प्रबंधन में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है.

शर्मा ने छह अक्टूबर 2026 को लिखे अपने पिछले पत्र का हवाला देते हुए मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के इस्तेमाल, सॉफ्टवेयर के जरिए कथित अतार्किक तरीके से नाम हटाने और नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए फॉर्म-6 में अनधिकृत बदलावों पर सवाल उठाए हैं.

उनके मुताबिक, देशभर में विरोध प्रदर्शनों के बीच चुनाव आयोग ने राज्य निर्वाचन अधिकारियों से एसआईआर के तहत अब तक हटाए गए नामों की समीक्षा करने को कहा है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि हटाए गए नामों को अपील की प्रक्रिया के अलावा किस कानूनी तरीके से दोबारा शामिल किया जाएगा. शर्मा ने सवाल उठाया कि क्या पश्चिम बंगाल में बाहर किए गए 90 लाख से अधिक मतदाताओं और अन्य राज्यों के मतदाताओं के लिए अलग-अलग नियम अपनाए जा रहे हैं. उनका तर्क है कि फॉर्म-6 के जरिए हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ना कानूनी रूप से उचित नहीं हो सकता.

एसआईआर सॉफ्टवेयर की पारदर्शिता पर सवाल

शर्मा ने मतदाता सूची तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर की पारदर्शिता पर भी चिंता जताई है. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि चुनाव पंजीकरण अधिकारियों के लिए इस्तेमाल होने वाला ईआरओनेट सॉफ्टवेयर मूल रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन सी-डैक ने विकसित किया था. हालांकि, रिपोर्टर्स कलेक्टिव की जांच के अनुसार, वर्ष 2023 से ईआरओनेट 2.0 का संचालन टीसीएस कर रही है. आरोप है कि चुनाव आयोग ने इस व्यवस्था का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया और पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान नियमों में बदलाव के साथ सॉफ्टवेयर में भी परिवर्तन होते रहे.

शर्मा ने सवाल किया है कि क्या चुनाव आयोग ने जानबूझकर इन तथ्यों को छिपाया. उन्होंने इस पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग की है.

टीसीएस और भाजपा के बीच संबंधों की स्वतंत्र जांच की मांग

शर्मा ने ‘द वायर’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए टीसीएस को सॉफ्टवेयर संचालन की जिम्मेदारी दिए जाने में संभावित हितों के टकराव का मुद्दा उठाया है. रिपोर्ट में टीसीएस द्वारा भाजपा को बड़े पैमाने पर चंदा दिए जाने का उल्लेख करते हुए इस व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं.

उन्होंने एक अन्य रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसमें टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच विवाद के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और टीसीएस के प्रबंधन से जुड़े घटनाक्रम का उल्लेख है. शर्मा का कहना है कि इन रिपोर्टों के आधार पर भाजपा नेतृत्व और टीसीएस प्रबंधन के बीच संबंधों की प्रकृति की जांच जरूरी है. उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा है कि क्या उसे इन परिस्थितियों की जानकारी है और यदि है, तो उसने इस संबंध में स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की.

फॉर्म-7 के इस्तेमाल पर भी आपत्ति

शर्मा ने ‘द वायर’ की एक अन्य रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि चुनाव आयोग ने जमीनी स्तर के अधिकारियों को एक व्यक्ति द्वारा फॉर्म-7 के इस्तेमाल की संख्या सीमित करने का निर्देश दिया है. रिपोर्ट में प्रति व्यक्ति सात आवेदन की सीमा का उल्लेख है. शर्मा के अनुसार, इस तरह की सीमा तय करने का कोई स्पष्ट तार्किक आधार नहीं है.

उन्होंने कहा कि परिवार का कोई सदस्य किसी अन्य सदस्य की मृत्यु की सूचना देने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन यदि कोई व्यक्ति कई आवेदन दाखिल करता है, तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि कहीं इसके जरिए किसी खास वर्ग के मतदाताओं को निशाना तो नहीं बनाया जा रहा. उन्होंने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या उसे संभावित दुर्भावनापूर्ण मंशा से किए जा रहे नाम हटाने के प्रयासों का हिस्सा बनना चाहिए.

एसआईआर की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल

शर्मा का मानना है कि एसआईआर की मौजूदा प्रक्रिया युवा मतदाताओं को सूची में शामिल करने के बजाय मनमाने और प्रेरित तरीके से नाम हटाने का माध्यम बनती जा रही है. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है और तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा तेजी से कमजोर हो रहा है.

अपने पत्र के अंत में शर्मा ने चुनाव आयोग से देशभर में जारी एसआईआर प्रक्रिया तत्काल रद्द करने और पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया के आधार पर कराए गए विधानसभा चुनावों की वैधता पर सवाल स्वीकार करने की मांग की. उन्होंने आयोग से इन चुनावों को अमान्य घोषित करने का आग्रह किया और कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है.

ये निष्कर्ष और मांगें ई.ए.एस. शर्मा के पत्र तथा उसमें उद्धृत रिपोर्टों पर आधारित हैं. टीसीएस की भूमिका, चुनाव आयोग की प्रक्रिया और राजनीतिक संबंधों को लेकर उठाए गए सवालों की स्वतंत्र जांच या चुनावों की वैधता पर कोई न्यायिक निर्णय इस पत्र में प्रस्तुत नहीं किया गया है.

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