रुचिरा गुप्ता | जब तक हम नारीवादी लोकतंत्र नहीं बनाएंगे, तब तक हम सच्ची समानता हासिल नहीं कर सकते

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार, लेखिका और मानव तस्करी विरोधी कार्यकर्ता रुचिरा गुप्ता के साथ भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवी पिल्लई के जीवन, उनके मानवाधिकार संबंधी कार्यों और नोबेल पुरस्कार को लेकर हुई चर्चा पर बातचीत की. इस दौरान सवाल उठा कि नवी पिल्लई की उपलब्धियों पर भारत सरकार की ओर से अब तक सार्वजनिक प्रतिक्रिया क्यों नहीं आई है और उनके विचार मौजूदा राजनीतिक माहौल से किस तरह टकराते हैं.

रुचिरा गुप्ता ने बताया कि उनकी मुलाकात नवी पिल्लई से जुलाई 2000 में डरबन में आयोजित एड्स सम्मेलन के दौरान हुई थी. उस समय पिल्लई रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण की अध्यक्ष थीं. गुप्ता के मुताबिक, यौन हिंसा को युद्ध के हथियार और जनसंहार के एक संभावित तरीके के रूप में कानूनी मान्यता दिलाने में पिल्लई की भूमिका ऐतिहासिक रही है. दोनों की चिंताएं महिलाओं और बच्चों के अधिकारों तथा यौन हिंसा से प्रभावित लोगों की आवाज को नीति-निर्माण की प्रक्रिया तक पहुंचाने से जुड़ी थीं.

गुप्ता ने बताया कि वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त का पद संभालने के बाद पिल्लई ने मानव तस्करी से मुक्त हुए लोगों के अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जगह दिलाने के प्रयासों में सहयोग किया. दोनों ने पीड़ितों की आवाज संयुक्त राष्ट्र के नीति-निर्माताओं तक पहुंचाने और मानव तस्करी से बचे लोगों के लिए सहायता तंत्र स्थापित करने की दिशा में काम किया. गुप्ता ने जोर देकर कहा कि कानून और नीतियां बनाते समय उन महिलाओं को केंद्र में रखना जरूरी है, जो गरीबी, जातिगत भेदभाव और सामाजिक हाशिये पर होने के कारण सबसे अधिक प्रभावित होती हैं.

बातचीत का एक प्रमुख हिस्सा गाजा पर पिल्लई के नेतृत्व वाले संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग की रिपोर्ट रहा. गुप्ता ने कहा कि पिल्लई ने गंभीर राजनीतिक दबाव के बावजूद अपने निष्कर्षों की जिम्मेदारी ली. उनके अनुसार, पिल्लई की ताकत सबूतों, गवाहियों और कानून के आधार पर निष्कर्ष निकालने में है. रिपोर्ट को लेकर इजराइल की आलोचना और पिल्लई पर हुए व्यक्तिगत हमलों का जिक्र करते हुए गुप्ता ने कहा कि असहमति का जवाब तथ्यों और कानूनी तर्कों के आधार पर दिया जाना चाहिए.

नवी पिल्लई की दक्षिण अफ्रीकी पृष्ठभूमि और भारतीय जड़ों पर चर्चा करते हुए गुप्ता ने बताया कि उनका परिवार गिरमिटिया मजदूरों के इतिहास से जुड़ा है. पिल्लई ने रंगभेद विरोधी संघर्ष में हिस्सा लिया और नेल्सन मंडेला की वकील भी रहीं. उनके सार्वजनिक जीवन में संविधान, मानवाधिकार और महिलाओं की समानता लगातार केंद्रीय मुद्दे रहे हैं.

भारत सरकार की चुप्पी पर पूछे गए सवाल के जवाब में गुप्ता ने इसे वैचारिक मतभेद से जोड़कर देखा. उनके मुताबिक, पिल्लई जिन मूल्यों—मानवाधिकार, लोकतंत्र, नारीवाद और संवैधानिक जवाबदेही—के लिए खड़ी रही हैं, वे मौजूदा सरकार के राजनीतिक दृष्टिकोण से टकराते हैं. यह रुचिरा गुप्ता का राजनीतिक विश्लेषण था, न कि सरकार की ओर से बताई गई कोई आधिकारिक वजह.

बातचीत के अंत में गुप्ता ने पिल्लई के विचारों के संदर्भ में ‘नारीवादी लोकतंत्र’ की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि समानता केवल संविधान और सार्वजनिक संस्थाओं तक सीमित नहीं रह सकती; परिवार और समाज में भी बराबरी स्थापित करनी होगी. उनके अनुसार, घरों में कायम असमानता अक्सर सार्वजनिक जीवन में भी दोहराई जाती है.

पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

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