ग्रामीण झारखंड में ‘वीबी-जी राम जी’ योजना को लेकर डर और असमंजस 

‘स्क्रोल’ के अनुसार, मई 2025 में, झारखंड के रांची जिले के मुरकुनी गांव में 51 वर्षीय मैनी ओरैन की भीषण गर्मी में मनरेगा  के तहत कुआं निर्माण कार्य के दौरान तबीयत बिगड़ी और एक हफ्ते बाद उनकी मृत्यु हो गई. उनके इकलौते बेटे विश्वनाथ उरांव कहते हैं, "मेरी मां हर साल मनरेगा में काम करती थीं. यह काम गर्मियों के महीनों में हमारे लिए एक लाइफलाइन (जीवन रेखा) की तरह था जब कोई दूसरा काम नहीं मिलता."

विश्वनाथ का यह बयान इस बात का गवाह है कि ग्रामीण भारत के लिए रोजगार गारंटी योजनाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं. लेकिन आज, उसी लाइफलाइन पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं. दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार द्वारा पारित 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)' यानी वीबी-जी राम जी कानून ने 2006 से चल रहे मनरेगा की जगह ले ली है. 1 जुलाई 2026 से लागू होने वाले इस नए कानून को लेकर झारखंड के ग्रामीणों, कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों के बीच भारी चिंता और डर का माहौल है.

काम के आवंटन में भारी गिरावट: आंकड़ों का झटका

झारखंड जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य में इस बदलाव का असर जमीन पर दिखने लगा है. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नए कानून के आने से पहले ही काम के आवंटन में जानबूझकर कटौती की जा रही है.

चालू वित्तीय वर्ष के पहले महीने (अप्रैल) में झारखंड में मनरेगा के तहत सृजित मानव दिवसों (persondays) की संख्या पिछले साल के 1.4 करोड़ से घटकर महज 10 लाख रह गई है यानि 92.8% की ऐतिहासिक गिरावट.

करीब 3,300 की आबादी वाले बिशाखतंगा पंचायत (जिसमें मुरकुनी गांव आता है) में इस साल अब तक केवल 169 व्यक्तियों को ही काम मिल सका है. पंचायत की मुखिया स्नेहा एक्का बताती हैं कि इस साल मनरेगा के लिए फंड बेहद कम आया है और वे अब नई 'राम जी' योजना के शुरू होने का इंतजार कर रही हैं.

मुआवजे पर संकट और पलायन की मजबूरी

संक्रमण काल  के कारण प्रशासनिक असमंजस भी बढ़ गया है. विश्वनाथ उरांव अपनी मां की मृत्यु के एवज में 2 लाख रुपये के सरकारी मुआवजे के हकदार हैं, लेकिन योजनाओं के इस फेरबदल में उन्हें डर है कि उनकी फाइल कहीं दफ्तरों के चक्कर में न खो जाए.

दूसरी ओर, गांवों में काम न मिलने के कारण पलायन तेज हो गया है। मुरकुनी के निवासी दुल्ले उरांव बताते हैं कि पहले वे जनवरी से मई के बीच मनरेगा से 15,000 से 20,000 रुपये कमा लेते थे, जिससे खेती की लागत निकल आती थी. झारखंड में वर्तमान मजदूरी दर (254 रुपये) वैसे ही बहुत कम है, और अब काम भी बंद होने से लोग मजबूरी में शहरों की तरफ भाग रहे हैं.

प्रशासनिक मनमानी और संवादहीनता का आरोप

'मनरेगा वॉच' के झारखंड संयोजक जेम्स हेरेंज के अनुसार, "मनरेगा दशकों के श्रमिक आंदोलनों और व्यापक विचार-विमर्श का परिणाम था। इसके उलट, नई ‘वीबी-जी राम जी’ योजना को बिना किसी हितधारक  परामर्श के लागू कर दिया गया है."

कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा डर यह है कि मनरेगा के तहत काम पाना जहां श्रमिकों का 'कानूनी अधिकार' था, वहीं नए ढांचे में इसे प्रशासनिक विवेक पर छोड़ दिया गया है. अब केंद्र सरकार तय करेगी कि किन क्षेत्रों में काम का अधिकार लागू होगा, जो संघीय ढांचे और स्थानीय अधिकारों को कमजोर कर सकता है.

पुरानी व्यवस्था से मोहभंग और नई से नाउम्मीदगी

हालांकि, ऐसा नहीं है कि ग्रामीण पुरानी मनरेगा व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट थे. रांची के लालपुर चौक पर रोजाना सुबह काम की तलाश में जुटने वाली ग्रामीण महिलाओं का दर्द कुछ और ही कहानी बयां करता है. वहाँ महिलाएं 600 से 700 रुपये दिहाड़ी पर निर्माण कार्य या कैटरिंग का काम ढूंढती हैं.

अंगारा गांव की चोटी देवी कहती हैं, "अगर गांवों में मनरेगा ठीक से चलती और सही पैसा देती, तो हम सुबह 4 बजे उठकर शहर क्यों आते?" चोटी देवी ने दो साल पहले एक गोशाला निर्माण में 15-20 दिन काम किया था, लेकिन आज तक उन्हें एक रुपया भी नहीं मिला.डिजिटल हाजिरी की तकनीकी दिक्कतें और महीनों तक मजदूरी का न मिलना आम बात हो चुकी है.

रामगढ़ जिले की लक्ष्मी कुमारी कहती हैं, "मनरेगा में भ्रष्टाचार इस कदर था कि कई लोगों को मजदूरी ही नहीं मिली. जब तक सरकार हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को ठीक नहीं करेगी, तब तक कोई भी नया कानून या 'राम जी' जैसी योजना श्रमिकों का भला नहीं कर पाएगी।"

 

सरकार का दावा है कि मनरेगा से वीबी -जी राम जी में बदलाव पूरी तरह सुचारू और श्रमिक-केंद्रित होगा. लेकिन लिबटेक इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि राष्ट्रीय स्तर पर मानव दिवसों में 21.5% की गिरावट आई है और श्रमिकों को करीब 15,408 करोड़ रुपये की मजदूरी का नुकसान हुआ है.

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में 'राम जी' योजना को लेकर कोई उत्साह नहीं, बल्कि एक गहरा अविश्वास है. नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि सिर्फ नाम बदलने या नए पोर्टल बनाने से जमीनी हकीकत नहीं बदलेगी. जब तक पारदर्शिता, समय पर भुगतान और काम की गारंटी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक विकास की यह नई 'गारंटी' गरीबों के लिए सिर्फ कागजी दावों तक ही सीमित रहेगी.

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