‘बदलाव के लिए वोट दिया, लेकिन यह तो वैसा ही लग रहा है’: भाजपा की जीत के बाद राजनीतिक हिंसा की चपेट में कोलकाता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'परिवर्तन' एक ऐसा शब्द है जो दशकों से गूँज रहा है. पहले वामपंथ के 34 साल के शासन को हटाने के लिए और अब वर्तमान सत्ता के खिलाफ. लेकिन हालिया विधानसभा चुनावों के बाद कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों से जो तस्वीरें और कहानियाँ सामने आ रही हैं, वे किसी बड़े बदलाव की ओर नहीं बल्कि एक पुराने और डरावने ढर्रे की ओर इशारा करती हैं. चुनावी नतीजों के बाद राज्य में भड़की हिंसा ने न केवल राजनीतिक स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि आम आदमी के मन में 'परिवर्तन' की परिभाषा को भी धुंधला कर दिया है.
स्क्रोल के मुताबिक, चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद से पश्चिम बंगाल पुलिस ने हिंसा के आरोप में 433 लोगों को गिरफ्तार किया है और लगभग 200 एफआईआर दर्ज की गई हैं. राज्य भर में अब तक 4 लोगों की जान जा चुकी है और 1,100 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है. ये आंकड़े केवल पुलिसिया कार्रवाई को नहीं दर्शाते, बल्कि उस डर और असुरक्षा को भी बयां करते हैं जो बंगाल की गलियों में घर कर गई है. हिंसा की यह लहर केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने कोलकाता के शहरी हृदय को भी अपनी चपेट में ले लिया है.
हिंसा का सबसे भयावह चेहरा कोलकाता हवाई अड्डे के पास देखने को मिला, जहाँ भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहायक चंद्रनाथ रथ की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह घटना उस समय हुई जब लोग जीत के जश्न और हार के गम के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश कर रहे थे. एक गरीब दिहाड़ी मजदूर चंपा चक्रवर्ती, जिसके घर के पास यह हत्या हुई, का कहना है कि "हम गरीबों का इन सब से कोई लेना-देना नहीं है. कोई भी पार्टी हमारे लिए कुछ नहीं करती." चंपा की यह बात उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ सत्ता की लड़ाई में मोहरे हमेशा आम नागरिक ही बनते हैं.
कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाके जैसे तोपसिया और व्यापारिक केंद्र न्यू मार्केट भी इस तनाव से अछूते नहीं हैं. तोपसिया में तृणमूल और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़पें सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही हैं. वहीं, न्यू मार्केट में 150 साल पुराने व्यापारिक प्रतिष्ठान आज सन्नाटे में डूबे हैं. व्यापारियों का कहना है कि चुनाव के समय व्यापार प्रभावित होना आम बात है, लेकिन नतीजों के 3 दिन बाद भी बाजार का 'सुनसान' रहना चिंताजनक है. हिंसा की खबरों ने न केवल स्थानीय लोगों को डराया है, बल्कि दूसरे राज्यों में बैठे उनके परिजनों को भी व्याकुल कर दिया है.
सबसे दुखद पहलू यह है कि सत्ता के हस्तांतरण या सुदृढ़ीकरण के साथ हिंसा का तरीका नहीं बदला है. न्यू मार्केट के पास एक तृणमूल कार्यालय को बुलडोजर से ढहा दिया गया और उस पर भाजपा का झंडा लगा दिया गया. स्थानीय निवासियों का मानना है कि यह वही 'वसूली' और 'दबंगई' की राजनीति है जो पहले वामपंथियों और फिर तृणमूल के समय देखी गई थी. अब भाजपा के सत्ता में आने या मजबूत होने पर भी वही तरीके अपनाए जा रहे हैं.
आज कोलकाता की सड़कों पर चलने वाले रिक्शा और बसों पर लगे झंडे अक्सर स्वेच्छा से नहीं, बल्कि सुरक्षा के डर से लगाए जाते हैं. एक ई-रिक्शा चालक का यह कहना कि "सब कुछ वैसा ही लग रहा है," इस बात का प्रमाण है कि केवल चेहरे और झंडे बदले हैं, व्यवस्था की क्रूरता वहीं की वहीं है. बंगाल का आम नागरिक आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. उसने बदलाव के लिए वोट दिया था ताकि हिंसा और डर का माहौल खत्म हो सके, लेकिन हकीकत में उसे केवल हिंसा का एक नया संस्करण मिला है. यदि राजनीतिक दल अपनी जीत को प्रतिशोध का जरिया बनाना बंद नहीं करते, तो बंगाल में 'परिवर्तन' केवल एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा और लोकतंत्र की आत्मा लहूलुहान होती रहेगी.

