पति की आर्थिक स्थिति के आधार पर भरण-पोषण का निर्धारण होना चाहिए, न कि पत्नी की एमबीए डिग्री या पिछली कमाई पर: इलाहाबाद हाई कोर्ट 

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक,  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पत्नी को मिलने वाले भरण-पोषण का निर्धारण पति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल पत्नी की शैक्षणिक योग्यता या उसकी पिछली आय को देखकर. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला का शिक्षित होना या पहले नौकरी करना उसे भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं करता.

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने एक वैवाहिक विवाद मामले की सुनवाई के दौरान की. मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें पत्नी ने परिवार न्यायालय द्वारा तय किए गए 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण को बढ़ाने की मांग की थी. उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि भरण-पोषण की राशि तय करते समय पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर को ध्यान में रखना आवश्यक है.

मामले के अनुसार, दंपति की शादी अगस्त 2014 में अहमदाबाद में हुई थी. पत्नी का आरोप था कि विवाह के एक महीने के भीतर ही दहेज की मांग को लेकर उसे ससुराल से निकाल दिया गया. तब से वह अपने मायके में रह रही है और उसे पति की ओर से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली. पत्नी ने अदालत में दावा किया कि उसका पति विदेश शिक्षा परामर्श का व्यवसाय चलाता है और सालाना लगभग 5 करोड़ रुपये कमाता है. उसने यह भी कहा कि वह फिलहाल बेरोजगार है और अपने पिता पर निर्भर है, इसलिए उसे 25,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दिया जाए.

वहीं पति की ओर से कहा गया कि पत्नी उच्च शिक्षित है और उसके पास MBA की डिग्री है. पति ने दावा किया कि पत्नी पहले कई कंपनियों में काम कर चुकी है और 50,000 रुपये प्रतिमाह तक कमा सकती है. उसने यह भी कहा कि उसकी खुद की आय केवल 15 से 20 हजार रुपये मासिक है और उस पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ है.

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पाया कि पति ने किसी भी स्तर पर पत्नी को अपने साथ रखने की इच्छा नहीं जताई. अदालत ने कहा कि जिरह के दौरान भी पति की ओर से ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पत्नी का अलग रहना उचित था.

अदालत ने यह भी माना कि पत्नी ने पहले नौकरी की थी और लगभग 37,000 रुपये प्रतिमाह कमाती थी, लेकिन भरण-पोषण आवेदन दाखिल करते समय वह बेरोजगार थी. न्यायालय ने कहा कि केवल इस आधार पर कि महिला शिक्षित है या पहले कमाती थी, उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता. उसकी वर्तमान स्थिति और उस जीवन स्तर को भी देखा जाना चाहिए, जिसमें वह ससुराल में रहती थी.

इसके अलावा अदालत ने पति द्वारा दिए गए वित्तीय विवरणों में भी कई विसंगतियां पाईं. आयकर रिटर्न और व्यवसाय में हिस्सेदारी को लेकर पति के दावों में अंतर पाया गया. अदालत ने कहा कि पूर्ण वित्तीय रिकॉर्ड प्रस्तुत न करना और आय संबंधी अस्पष्टता उसके सीमित आय के दावों पर गंभीर संदेह पैदा करती है.

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण पर्याप्त और न्यायसंगत नहीं है. अदालत ने मामले को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की राशि के नए निर्धारण के लिए परिवार न्यायालय को वापस भेज दिया.

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