सोनिया गांधी का विशेष साक्षात्कार: ‘भाजपा द्वारा भारत के सामाजिक ताने-बाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया है’

हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित और जल्द ही लॉन्च होने वाली आत्मकथात्मक पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ के संदर्भ में, उन्होंने ‘द हिंदू’ अखबार को एक बेहद विस्तृत और खुला साक्षात्कार दिया है. वरिष्ठ पत्रकार एन. राम द्वारा पूछे गए इन सवालों के माध्यम से सोनिया गांधी ने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं, व्यक्तिगत संघर्षों, ऐतिहासिक मोड़ों और देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर खुलकर अपने विचार रखे हैं.

इस साक्षात्कार में जिन प्रमुख विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है, उनमें मुख्य रूप से शामिल हैं—उन्हें अपनी आत्मकथा लिखने की प्रेरणा कैसे और क्यों मिली; वे कौन-से बुनियादी नैतिक और सामाजिक मूल्य थे जिन्हें उन्होंने अपने शुरुआती जीवन में इटली में सीखा और बाद में भारत आकर अपनाया व संजोया; उनके राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन को आकार देने में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की क्या भूमिका रही; वर्तमान भाजपा-आरएसएस शासन के दौरान देश के लोकतंत्र, संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को पहुंचे कथित भारी नुकसान पर उनकी चिंताएं; 1975 से 1977 के बीच के आपातकाल का वह दौर जिसे उन्होंने जिया और आज पीछे मुड़कर वे उसे किस रूप में देखती हैं; उनके जीवन के सबसे बड़े राजनीतिक फैसले—जैसे 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभालना, 1999 में पार्टी के भीतर उठी बगावत और चुनौतियों के बावजूद पद पर बने रहना, और अंततः 2004 में भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री पद के प्रस्ताव को स्वेच्छा से ठुकराना; देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां और कांग्रेस पार्टी व उसके सहयोगी दलों का भविष्य; तथा पुस्तक के प्रकाशन से ठीक कुछ हफ्ते पहले भारत में इसके प्रकाशक के अचानक बदले जाने से जुड़े घटनाक्रम.

अपनी कहानी लिखने का सफर और दूसरों की लिखी किताबें

साक्षात्कार की शुरुआत इस बात से होती है कि हाल ही में सोनिया गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा था— ‘दूसरों ने मेरी “कहानी” बताने में दशकों बिता दिए, अब मेरी बारी है.’ एआई-आधारित ग्रंथ सूची के अनुसार, सोनिया गांधी के जीवन और व्यक्तित्व पर अब तक कम से कम 75 से अधिक पुस्तकें और जीवनियां लिखी जा चुकी हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या दूसरों द्वारा उनके जीवन का आकलन करने पर उन्हें कभी झुंझलाहट हुई और क्या उन्होंने उन किताबों को कभी पढ़ा, तो उनका जवाब बेहद सहज था.

उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि उनके ऊपर इतनी सारी किताबें लिखी जा चुकी हैं. उन्होंने कभी भी अपने ऊपर लिखी गई किताबों को पढ़ने की इच्छा महसूस नहीं की. बहुत पहले ही राजीव गांधी और उन्होंने यह समझ लिया था कि उनके बारे में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उस पर लगातार नजर रखना या उसे सुधारने की कोशिश करना व्यर्थ है. हालांकि, जैसा कि वह अपनी किताब में भी जिक्र करती हैं, एक ऐसा वक्त आया जब उन्हें खुद महसूस हुआ कि अब समय आ गया है कि उन्हें अपनी कहानी दुनिया के सामने खुद रखनी चाहिए.

अपनी किताब के लेखन प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि इसे लिखने का सफर काफी लंबा और टुकड़ों में पूरा हुआ. उन्होंने पहली बार एक दशक से भी अधिक समय पहले थोड़ा-बहुत लिखना शुरू किया था, लेकिन लगभग पांच साल पहले उन्होंने इसे पूरी गंभीरता और निरंतरता के साथ लिखना शुरू किया. यह उनके लिए कोई आसान या निर्बाध प्रक्रिया नहीं थी; कई बार शब्द और विचार बहुत सहजता से प्रवाहित होते थे, तो कई बार ऐसा भी दौर आया जब वे हताशा में अपने हाथ खड़े कर देती थीं क्योंकि कुछ भी लिखना संभव नहीं हो पा रहा था.

एक प्रेम कहानी और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश

सोनिया गांधी अपनी पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग’ को मुख्य रूप से एक व्यक्तिगत संस्मरण मानती हैं, जिसमें राजनीति केवल एक पृष्ठभूमि या ढांचे के रूप में मौजूद है. उनके अनुसार, इस पुस्तक के केंद्र में एक सच्ची और गहरी प्रेम कहानी है—राजीव और सोनिया के बीच का वह चुंबकीय और असाधारण आकर्षण जो धीरे-धीरे एक विशाल रिश्ते में बदल गया. इसी प्रेम ने उन्हें सत्ता के सर्वोच्च गलियारों तक खींचा, फिर अनिच्छा के साथ सार्वजनिक जीवन और राजनीति में धकेला, और अंततः उन्हें देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेतृत्व में लाकर खड़ा कर दिया.

जब उनसे पूछा गया कि क्या उनका यह जीवन किसी फिक्शन या उपन्यास से भी ज्यादा अद्भुत है, तो उन्होंने सहमति जताई और कहा कि यही वह वजह थी जिसके कारण उन्होंने इतने लंबे समय तक इस बारे में सार्वजनिक रूप से बात करने से परहेज किया. यह केवल दो इंसानों के बीच के प्रेम की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात की भी दास्तान है कि कैसे उन्होंने राजीव के परिवार और उस देश (भारत) से गहरा लगाव महसूस किया, जिससे वे ताल्लुक रखते थे, और फिर धीरे-धीरे वे खुद भी इसी देश की होकर रह गईं. जब उन्होंने देखा कि उनके परिवार द्वारा देश के लिए दिए गए बलिदानों के उद्देश्यों को खतरे में डाला जा रहा है और जिस पार्टी को उन्होंने सींचा था वह कमजोर हो रही है, तब इसी प्रेम और कर्तव्य-भाव ने उन्हें राजनीति के मैदान में उतरने के लिए मजबूर किया.

पारिवारिक मूल्य और राजनीतिक विरासत

इटली के एक छोटे से शहर के सामान्य और पारिवारिक परिवेश से निकलकर भारत के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार का हिस्सा बनने तक के सफर पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि उनके शुरुआती संस्कार आज भी उनके भीतर जीवित हैं. परिवार और दोस्तों के प्रति वफादारी, दूसरों के प्रति सच्ची संवेदना, ईमानदारी और अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाना—ये वे मूल्य हैं जो आज भी उन्हें वही इंसान बनाए हुए हैं जिससे राजीव गांधी साठ साल पहले मिले थे.  हालांकि, उन्होंने मुस्कुराते हुए यह भी जोड़ा कि उस दौर में वह आज की तुलना में कहीं अधिक हंसती-मुस्कुराती थीं.

अपने जीवन के केंद्रीय पात्रों—राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के बारे में बात करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि जब वह एक नई और अनजान बहू के रूप में भारत आई थीं, तब उन्हें यहां के बारे में कुछ भी नहीं पता था. आज वह जो कुछ भी हैं या जितना भी जानती हैं, वह सब उन्होंने इन्हीं दोनों महान व्यक्तित्वों से सीखा है. उनका अदम्य साहस, उनकी गहरी सहानुभूति, एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के प्रति उनकी अडिग प्रतिबद्धता, और सबसे ऊपर—कर्तव्य की वह भावना जो उनके लिए सर्वोपरि थी—ऐसी बातें थीं जिन्होंने सोनिया गांधी को जीवन के हर मुश्किल दौर और संदेह के क्षणों में संबल और मजबूती दी.

आपातकाल के दौर पर आत्ममंथन

साक्षात्कार में देश के इतिहास के सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक यानी 1975-1977 के आपातकाल पर भी खुलकर बात की गई. जब उनसे पूछा गया कि क्या संजय गांधी को आपातकाल का मुख्य प्रतीक माना जाता है और क्या इंदिरा गांधी ने अपने बेटे या अन्य लोगों की चेतावनी को समय रहते सुन लिया होता तो ज्यादतियों से बचा जा सकता था, तो सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया कि दबाव केवल एक व्यक्ति की ओर से नहीं था, बल्कि पार्टी के कई वरिष्ठ सहयोगियों का भी भारी दबाव था. उस समय इंदिरा गांधी के आसपास राजीव जैसे बहुत कम लोग थे जो उनसे अलग और स्वतंत्र दृष्टिकोण रखते थे. अंततः, इंदिरा गांधी ने खुद अपनी राजनीतिक सूझबूझ और दूरदर्शिता से स्थिति की गंभीरता को समझा और इसे सुधारने के लिए कदम उठाए.

आपातकाल को एक अलोकतांत्रिक और सत्तावादी अध्याय के रूप में स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि उस दौर की वास्तविक भयावहता का अहसास उन्हें आपातकाल के बाद ही पूरी तरह हुआ. लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन और बंदी प्रत्यक्षीकरण का निलंबन संवैधानिक दायरे में भले किया गया हो, लेकिन जब वह खुद को उस विकट दौर में रखकर सोचती हैं, तो उन्हें इंदिरा गांधी का वह संघर्ष नजर आता है जिसमें वे हिंसक प्रदर्शनों, आगजनी, और राज्य व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करने वाली ताकतों से निपटने के लिए जूझ रही थीं. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यह इंदिरा गांधी ही थीं जिन्होंने खुद आगे बढ़कर हालात को पहचाना और मार्च 1977 के चुनावों की घोषणा की, तथा बाद में सार्वजनिक रूप से अपनी भूलों और ज्यादतियों (अतिशयताओं) के लिए खेद भी प्रकट किया था.

वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक समझौते

भारतीय राजनीति और आरएसएस-भाजपा की विचारधारा पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने हमेशा से वैचारिक रूप से इन ताकतों का डटकर विरोध किया है. हालांकि पार्टी के भीतर कुछ ऐसे लोग भी रहे हैं जिनका यह मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर कांग्रेस को इतना स्पष्ट रुख नहीं अपनाना चाहिए, लेकिन यह कभी भी पार्टी का आधिकारिक दृष्टिकोण नहीं रहा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी वैचारिक भिन्नताओं को स्वीकार करते हुए उन्होंने माना कि भले ही वे बिल्कुल अलग वैचारिक दुनिया से आते हैं और देश को देखने का उनका नजरिया अलग है, लेकिन राजनीति में सफल होने के अपने रास्ते होते हैं. हालांकि, उनका यह भी मानना है कि कांग्रेस को अपनी वैचारिक लड़ाई लड़ने के लिए आरएसएस से सीखने की कोई आवश्यकता नहीं है.

अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन क्षणों को याद करते हुए उन्होंने उस घटना का जिक्र किया जब पार्टी के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं (जैसे शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर) ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था. उस अपमानजनक और आहत करने वाले पल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी सत्ता या बड़े पदों की लालसा के लिए राजनीति में कदम नहीं रखा था, बल्कि उनके लिए सबसे बड़ा आघात यह था कि जिन सहयोगियों पर उन्होंने भरोसा किया, उन्होंने ही उनकी भारत के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिए.  हालांकि, कुछ समय के आत्म-मंथन के बाद उन्होंने महसूस किया कि व्यक्तिगत दुखों और भावनाओं को अपने बड़े राजनीतिक और राष्ट्रीय उद्देश्यों के आड़े नहीं आने देना चाहिए.

2004 का ऐतिहासिक फैसला और भविष्य की राजनीति

अध्याय 30 का जिक्र करते हुए साक्षात्कार में उस बहुचर्चित घटना का भी उल्लेख किया गया जब 2004 में कांग्रेस की जीत के बाद सब को यह उम्मीद थी कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनेंगी. उनके बच्चे (राहुल और प्रियंका) अपनी दादी और पिता की दुखद हत्याओं के साए में पलने के कारण इस पद से जुड़े संभावित खतरों को लेकर बेहद डरे हुए थे और इसका कड़ा विरोध कर रहे थे. भारी राजनीतिक ड्रामे और पार्टी नेताओं के दबाव के बीच उन्होंने एक पल के लिए हामी भर दी थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना फैसला बदल दिया और डॉ. मनमोहन सिंह को देश की कमान सौंपी. जब उनसे पूछा गया कि क्या वह कभी सोचती हैं कि यदि उन्होंने वह पद संभाल लिया होता तो नीतियां अलग होतीं, तो उनका स्पष्ट कहना था कि यह विचार उनके मन में कभी नहीं आया क्योंकि उन्होंने और डॉ. सिंह ने एक बेहतरीन टीम के रूप में मिलकर काम किया था.

अंत में, देश के वर्तमान राजनीतिक हालातों, विपक्षी एकता और कांग्रेस की संभावनाओं पर बात करते हुए सोनिया गांधी ने गहरी आशा व्यक्त की. उनका मानना है कि भले ही पिछले एक दशक में देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को भारी क्षति पहुंचाई गई है, और विपक्षी दलों को एक समान अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड) नहीं मिल रहा है, फिर भी कांग्रेस पार्टी और उसके कार्यकर्ता हर मोर्चे पर डटकर मुकाबला कर रहे हैं. उन्हें पूरा विश्वास है कि देश की जनता जल्द ही उचित शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का स्वागत करेगी.

(यह इंटरव्यू का हिंदी में अनूदित और संपादित सारांश है. अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित मूल इंटरव्यू यहां भी पढ़ा जा सकता है.)

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