उत्तर प्रदेश चुनाव: ‘भीम और मीम’ समीकरण के सहारे ओवैसी की सपा पर पैनी नजर, बसपा से गठबंधन की तलाश

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के लिए लालमणि वर्मा की रिपोर्ट है कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राज्य का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है. विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन में शामिल होने के असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रस्ताव को समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा खारिज किए जाने के बाद, ओवैसी ने राज्य में अपना राजनीतिक हमला और चुनाव प्रचार तेज कर दिया है. एआईएमआईएम का मुख्य फोकस उन सीटों पर है जो फिलहाल सपा के कब्जे में हैं.

गठबंधन की नई संभावनाएं और रणनीतिक कदम

फरवरी 2027 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर, एआईएमआईएम मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) या नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद की 'आजाद समाज पार्टी (कांशीराम)' के साथ गठबंधन की संभावनाओं को टटोल रही है.

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के अनुसार, एआईएमआईएम इस चुनाव में 100 सीटों पर ताल ठोकने की तैयारी कर रही है. उनका कहना है कि पार्टी दलितों और मुसलमानों के सामाजिक समीकरण को साधने के लिए ‘भीम और मीम’ का प्राकृतिक गठबंधन बनाना चाहती है. इस सिलसिले में बसपा से संपर्क साधा गया है और सकारात्मक प्रतिक्रिया का इंतजार है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में दलितों (21%) और मुसलमानों (19%) की मजबूत हिस्सेदारी एक बड़ा समीकरण बनाती है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है.

सपा और भाजपा पर तीखे हमले

अपने प्रचार अभियान की शुरुआत 14 जून को बहराइच जिले के मटेरा से करने के बाद से ओवैसी कैराना, स्वार, दीदारगंज, भिनगा, कानपुर कैंट, मुरादाबाद देहात, सहारनपुर देहात और नजीबाबाद जैसी जगहों पर कई बड़ी जनसभाएं कर चुके हैं. इन सभी मंचों से ओवैसी ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को मुख्य तौर पर निशाने पर लिया है.

ओवैसी ने आरोप लगाया है कि सपा सिर्फ मुसलमानों के वोट हासिल करती है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम बदलकर "समाजवादी यादव परिवार" रख लेना चाहिए, क्योंकि वे अपने परिवार के सदस्यों के लिए मुस्लिम-यादव बहुल "सुरक्षित सीटें" आरक्षित रखते हैं.

एआईएमआईएम ने सपा पर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा में नाकाम रहने और समय के साथ उनकी उपेक्षा करने का पुराना मुद्दा भी फिर से उठाया है. पार्टी नेताओं का दावा है कि सपा और भाजपा दोनों ही राजनीतिक मुनाफे के लिए मुस्लिम समाज का शोषण करती हैं—जहां एक तरफ सपा भाजपा का डर दिखाकर वोट लेती है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा हिंदुओं को मुसलमानों का भय दिखाती है.

चुनावी इतिहास और सीटों का गणित

एआईएमआईएम उन 14 मुस्लिम-बहुल सीटों पर विशेष जोर दे रही है, जिन पर 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा ने जीत दर्ज की थी. उस चुनाव में सपा ने 403 में से 111 सीटें जीती थीं, जिनमें से 9 सीटों पर मुस्लिम विधायक सपा के टिकट पर जीते थे. अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए एआईएमआईएम ने मटेरा से शौकत अली, कैराना से इंजीनियर इरफान और भिनगा से दद्दन खान जैसे उम्मीदवारों के नामों का ऐलान भी कर दिया है.

हालांकि, एआईएमआईएम का पिछला चुनावी रिकॉर्ड बहुत मजबूत नहीं रहा है. 2022 के यूपी चुनाव में पार्टी ने 95 सीटों पर ‘भागीदारी परिवर्तन मोर्चा’ के तहत चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे केवल 2% वोट मिले थे और सभी सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी. इसके विपरीत, 2025 के बिहार चुनावों में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए एएसपी (कांशीराम) के साथ मिलकर लड़ी गई 28 में से 5 सीटों पर जीत हासिल की थी.

सत्तारूढ़ दल की प्रतिक्रिया

सपा और एआईएमआईएम की इस तनातनी को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने लिए एक बड़े सियासी मौके के रूप में देख रही है.  भाजपा नेताओं का मानना है कि यदि एआईएमआईएम और बसपा का गठबंधन होता है, तो मुस्लिम वोटों का बिखराव तय है. इससे मुख्य विपक्षी दल सपा कमजोर होगी और भाजपा नीत एनडीए गठबंधन की स्थिति और अधिक मजबूत हो जाएगी. कुल मिलाकर, ओवैसी के आक्रामक तेवर और नए समीकरणों की तलाश ने यूपी के चुनावी रण को बेहद दिलचस्प बना दिया है.

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