न्याय की कीमत, जेल की यादें और उम्मीद का साहस: प्रबीर पुरकायस्थ की कहानी
भारत में पत्रकारिता पर बढ़ते दबाव, जांच एजेंसियों की सक्रियता और असहमति की आवाजों पर कानूनी कार्रवाई के बीच दिल्ली हाई कोर्ट का एक हालिया फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की कानूनी जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि उसे प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़क्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दिल्ली पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दर्ज मामलों को खारिज करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्रवाई को "कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग", "दुर्भावनापूर्ण" और "मनमाना हमला" बताया. अदालत ने कहा कि आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री नहीं थी और स्वतंत्र पत्रकारिता को निशाना बनाया गया.
इस फैसले के बाद प्रबीर पुरकायस्थ ने राहत जरूर महसूस की, लेकिन उन्होंने इसे अंतिम जीत मानने से इनकार किया. उनका कहना है कि यह केवल एक मामला है और संभव है कि सरकार इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे. फिर भी यह फैसला उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो पिछले कुछ वर्षों से पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक असहमति पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंतित रहे हैं.
पुरकायस्थ के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की शुरुआत अगस्त 2020 में हुई थी, जब दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने विदेशी निवेश नियमों के कथित उल्लंघन का मामला दर्ज किया. इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया. अगस्त 2023 में उन पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून यानी यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया और बाद में विदेशी अंशदान विनियमन कानून से जुड़ा एक और मामला सामने आया.
इन मामलों और लगातार पड़ती छापेमारियों का असर केवल पुरकायस्थ पर नहीं पड़ा. न्यूज़क्लिक का पूरा न्यूज़रूम इसकी चपेट में आया. कर्मचारियों की नौकरियां गईं, संस्थान की कार्यप्रणाली बाधित हुई और लंबे समय तक भय और अनिश्चितता का माहौल बना रहा. चीन से कथित संबंधों को लेकर लगाए गए आरोपों को मीडिया के एक हिस्से ने व्यापक रूप से प्रचारित किया, जबकि इन आरोपों को लेकर लगातार सवाल भी उठते रहे.
ऐसे समय में अदालत का यह फैसला कई लोगों को न्यायपालिका की उस भूमिका की याद दिलाता है, जहां संवैधानिक संस्थाएं राज्य की शक्ति पर नियंत्रण का काम करती हैं. यह भी याद दिलाता है कि लोकतंत्र में न्यायिक स्वतंत्रता केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं की अंतिम सुरक्षा रेखा है.
प्रबीर पुरकायस्थ के लिए यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने राज्य की शक्ति का सामना किया हो. आपातकाल के दौरान भी वे जेल गए थे और 2023 में यूएपीए मामले में उन्हें फिर जेल जाना पड़ा. जब उनसे पूछा गया कि दोनों दौरों में क्या अंतर था, तो उनका जवाब दिलचस्प था.
उनके अनुसार आपातकाल के दौरान अनिश्चितता कहीं अधिक थी, क्योंकि उस समय नागरिकों के कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे और अदालतों तक पहुंच भी लगभग बंद थी. आज परिस्थितियां कठिन हैं, लेकिन कानून की प्रक्रिया और न्यायालयों तक पहुंच अब भी मौजूद है.
फिर भी यूएपीए जैसे कानूनों के तहत वर्षों तक मुकदमे चले बिना जेल में रहना पड़ सकता है. ऐसे में क्या उन्हें डर नहीं लगा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध नहीं माना होता तो उन्हें वर्षों जेल में बिताने पड़ सकते थे?
इस सवाल पर उनका जवाब जीवन के एक बड़े अनुभव से निकला हुआ लगता है. उनका कहना है कि आपातकाल ने उन्हें एक बात सिखाई थी—"जो सामने है, उसका सामना करो. यह मत सोचो कि बाहर कब निकलोगे. सिर्फ यह सोचो कि अभी क्या करना है. अनिश्चितता ही इंसान की इच्छाशक्ति को सबसे ज्यादा कमजोर करती है."
जेल की चर्चा के दौरान बातचीत एक दिलचस्प दिशा में चली जाती है. पुरकायस्थ बताते हैं कि इस बार उन्हें रोहिणी जेल में रखा गया, जिसे वे तिहाड़ से भी ज्यादा कठिन जेल मानते हैं. आपातकाल के दौरान राजनीतिक बंदियों को अलग तरह का व्यवहार मिलता था, क्योंकि उन्हें राजनीतिक कैदी माना जाता था. लेकिन आज ऐसे मामलों में आरोपित व्यक्ति को लगभग दोषी मानकर व्यवहार किया जाता है, जबकि अदालत में उसका अपराध अभी सिद्ध भी नहीं हुआ होता.
फिर भी जेल के भीतर मानवीय रिश्ते खत्म नहीं होते. वे बताते हैं कि उनके साथ कई अन्य राजनीतिक बंदी भी थे और समय बिताने के लिए वे इतिहास पर चर्चा किया करते थे. समकालीन राजनीति से दूर रहते हुए वे मध्यकालीन और औपनिवेशिक इतिहास पर बातें करते थे.
जेल के खाने और रहने की परिस्थितियों को लेकर भी उनकी टिप्पणियां ध्यान खींचती हैं. वे बताते हैं कि आज भोजन की गुणवत्ता पहले की तुलना में बेहतर है. दाल, चावल, सब्जी और प्रोटीन युक्त भोजन उपलब्ध होता है. इसके उलट सत्तर के दशक में आम कैदियों को मिलने वाला भोजन अक्सर बेहद खराब गुणवत्ता का होता था.
लेकिन जेलों की एक बड़ी समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है—भीड़भाड़. रोहिणी जेल की बैरकों में क्षमता से दो से तीन गुना अधिक कैदी मौजूद थे. रात में सोने की स्थिति ऐसी होती थी कि यदि बगल में लेटा व्यक्ति करवट बदलता, तो दूसरे को भी करवट बदलनी पड़ती.
जब उनसे पूछा गया कि जेल जीवन की सबसे गहरी स्मृति क्या है, तो उन्होंने आपातकाल के दौरान देखे एक फांसी के दिन को याद किया. उनका कहना था कि उस दिन जेल के भीतर एक अजीब सन्नाटा और उदासी थी. कठोर अपराधी हों या जेल कर्मचारी, हर कोई उस माहौल से प्रभावित था.
उनके शब्दों में, उसी दिन उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि मृत्युदंड कितना बड़ा और गंभीर विषय है. राज्य द्वारा किसी व्यक्ति का जीवन लेना केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा नैतिक प्रश्न भी है. उस दिन का दृश्य और उससे जुड़ी भावनाएं आज तक उनका पीछा नहीं छोड़ पाईं.
और इस बार की सबसे बड़ी स्मृति?
इस सवाल पर वे मुस्कुराते हैं और छोटा सा जवाब देते हैं—"जमानत की खबर सुनना."
प्रबीर पुरकायस्थ की कहानी केवल एक पत्रकार की कानूनी लड़ाई की कहानी नहीं है. यह उस दौर का दस्तावेज भी है, जिसमें पत्रकारिता, असहमति और लोकतांत्रिक अधिकारों की सीमाएं लगातार परखी जा रही हैं. यह कहानी यह भी बताती है कि उम्मीद और निराशा के बीच झूलती दुनिया में शायद सबसे महत्वपूर्ण बात किसी एक को चुन लेना नहीं, बल्कि परिस्थितियों का सामना करते हुए आगे बढ़ते रहना है.
यह रिपोर्ट ‘आर्टिकल 14’ केलिए बेतवा शर्मा ने लिखी है.

