आने वाला लोकतंत्र: सरकारों को युवाओं की आवाज क्यों सुननी चाहिए

‘काउंटरकरंट्स’ में प्रोफेसर डॉ. पी. जे. थॉमस पथिलचिरा लिखते हैं कि लोकतंत्र कोई पूर्ण व्यवस्था नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है. फ्रांसीसी दार्शनिक जैक्स देरिदा की ‘आने वाले लोकतंत्र’ की अवधारणा के अनुसार, लोकतंत्र को लगातार बेहतर बनाने की जरूरत होती है. इसकी वास्तविक ताकत लोगों को मौजूदा व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाने और सत्ता के दुरुपयोग को चुनौती देने की स्वतंत्रता देने में है.

लेखक के मुताबिक, लोकतंत्र की इसी प्रक्रिया में जन आंदोलन और विरोध प्रदर्शन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. एक अन्य फ्रांसीसी दार्शनिक जैक्स रांसिएर मानते हैं कि लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप असहमति में दिखाई देता है. जब हाशिये पर पड़े लोग अपनी आवाज उठाते हैं, मौजूदा कानूनों और सत्ता संरचनाओं को चुनौती देते हैं तथा अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तभी लोकतांत्रिक राजनीति जीवंत होती है.

भारत में युवाओं की भूमिका इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है. लेख में कहा गया है कि देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और औसत आयु 29 वर्ष है. इतनी बड़ी युवा आबादी होने के बावजूद राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में उनकी वास्तविक भागीदारी और प्रतिनिधित्व चिंता का विषय है. लेखक का मानना है कि युवाओं के पास तकनीकी कौशल, प्रगतिशील विचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की क्षमता है, जिसका इस्तेमाल सुशासन को मजबूत करने में किया जा सकता है.

लेखक अंग्रेजी कवि पर्सी बिश शेली की कविता ‘ओड टू द वेस्ट विंड’ के जरिए लोकतांत्रिक बदलाव की संभावना को समझाते हैं. कविता में पश्चिमी हवा पुरानी और जर्जर व्यवस्था को हटाकर नए जीवन के लिए रास्ता बनाने वाली क्रांतिकारी शक्ति का प्रतीक है. इसकी प्रसिद्ध पंक्ति, “यदि सर्दी आती है, तो क्या वसंत दूर हो सकता है?”, संघर्ष के बाद बदलाव की उम्मीद जगाती है.

इसी रूपक के माध्यम से लेखक कहते हैं कि जनता की सामूहिक आवाज भ्रष्ट और जड़ राजनीतिक संरचनाओं को बदल सकती है. इसलिए सत्ताधारी दलों को आंदोलनों को केवल अपनी सत्ता के लिए खतरे के रूप में नहीं देखना चाहिए. जनता के असंतोष को दबाने के बजाय उसके कारणों को समझना और संवाद के जरिए समाधान तलाशना जरूरी है.

लेख में कहा गया है कि लोकतंत्र में जनता की बात सुनना, उसे संबोधित करने जितना ही महत्वपूर्ण है. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बनाए गए सैन्य और सुरक्षा तंत्र का अपने ही नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल करना जनहित के विरुद्ध है. अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए लेखक याद दिलाते हैं कि कुछ लोगों को कुछ समय तक भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन सभी लोगों को हर समय धोखे में नहीं रखा जा सकता.

लेखक के अनुसार, लोकतंत्र में अंतिम अधिकार जनता के पास होता है. सरकारों के पास जनता का विश्वास जीतकर लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने का अवसर हमेशा रहता है. लेकिन यदि वे युवाओं की आवाज को अनसुना करती हैं और उनके आंदोलनों को कुचलने का प्रयास करती हैं, तो वे इतिहास के गलत पक्ष में खड़ी हो सकती हैं.

लेख का केंद्रीय संदेश है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए असहमति का सम्मान, खुला संवाद और युवाओं की सार्थक भागीदारी जरूरी है. लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी आगे बढ़ सकती है, जब सत्ता जनता की आवाज सुनने और अपनी कमियों को सुधारने के लिए तैयार हो.

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