दिल्ली पुलिस हिंसा को चुनौती देने वालों को आपराधिक मुकदमों के जरिए कैसे डराती है और पीड़ितों को ही आरोपी बनाती है

आर्टिकल-14’ में निदाह कैसर, प्रन्नव धवन और सबाह गुरमत की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस पर आरोप है कि वह अपने अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने वालों को ही आपराधिक मामलों में फँसाकर डराती है. इससे पुलिस के खिलाफ लगाए गए मूल आरोपों से ध्यान भटकने की आशंका भी पैदा होती है. रिपोर्ट में पत्रकार रोज़ी का मामला इसका उदाहरण है.

रिपोर्ट के अनुसार, सहायक पुलिस आयुक्त विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली रोज़ी ने 3 अक्टूबर को दो अन्य महिला पत्रकारों के साथ शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज न किए जाने को लेकर पुलिस की आलोचना हुई और विरोध प्रदर्शन भी हुए. इस बीच, पुलिस ने दावा किया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित सीसीटीवी तस्वीर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से बनाई गई थी. इस तस्वीर को प्रसारित करने के आरोप में हरियाणा के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया.

13 अक्टूबर को एसीपी की शिकायत के आधार पर रोज़ी और अन्य लोगों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई. शिकायत में जातिसूचक टिप्पणियाँ करने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप लगाए गए. हालांकि, इस प्राथमिकी में रोज़ी की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों का उल्लेख नहीं था.

रोज़ी ने इस कार्रवाई को प्रतिशोध बताते हुए प्राथमिकी रद्द करने की मांग की. 15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी. अगले दिन, दिल्ली हाई कोर्ट ने जाँच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.

रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह की कार्रवाई शिकायतकर्ताओं को डराने और उन्हें न्याय माँगने से हतोत्साहित करने का माध्यम बन सकती है. जब पुलिस के खिलाफ शिकायत करने वाले व्यक्ति को ही आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ता है, तो मूल शिकायत से ध्यान हटने और पीड़ित पर दबाव बढ़ने का खतरा रहता है.

यह मामला पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाता है: जब किसी पुलिस अधिकारी पर आरोप लगता है और जाँच भी उसी पुलिस व्यवस्था के भीतर होती है, तो निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित की जाए? रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि पुलिस के खिलाफ लगे आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, ताकि शिकायत करने वालों को न्याय माँगने के कारण ही कानूनी कार्रवाई का सामना न करना पड़े.

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