एसआईआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए, फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं हुआ: निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा

भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े सभी फैसले आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से लिए थे. आयोग ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोपों को खारिज किया है.

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में उत्कर्ष आनंद की रिपोर्ट के मुताबिक,सोमवार को उप निर्वाचन आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु के माध्यम से दाखिल संयुक्त हलफनामे में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने कहा कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी एसआईआर संबंधी आदेश आयोग के सर्वसम्मत फैसलों पर आधारित थे. आयोग ने इन आदेशों को संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुरूप बताया.

हलफनामे में कहा गया है कि विचार-विमर्श के दौरान किसी निर्वाचन आयुक्त या अधिकारी की ओर से सुझाव देना, सवाल उठाना या आपत्ति जताना अपने आप में आयोग का निर्णय नहीं माना जा सकता. आयोग के अनुसार, फैसले सामूहिक चर्चा के बाद लिए जाते हैं. हलफनामे में उन मीडिया रिपोर्टों को भी खारिज किया गया, जिनमें दावा किया गया था कि संधू और जोशी ने दस महीनों के दौरान कम से कम 14 बार ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर आपत्ति जताई थी.

आयोग ने स्पष्ट किया कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव को जो पत्र भेजे थे, वे आयोग में प्रतिनियुक्त एक अधिकारी और काम के आंतरिक बँटवारे से संबंधित थे. हलफनामे के अनुसार, इन पत्रों को इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि एसआईआर से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए थे.

फॉर्म-6 में बदलाव से इनकार

नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक फॉर्म-6 में बदलाव करने के आरोपों को भी निर्वाचन आयोग ने खारिज किया है. आयोग का कहना है कि एसआईआर के दौरान आवेदन के साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र देना आवश्यक किया गया था, लेकिन यह 1960 के निर्वाचक पंजीकरण नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म-6 का हिस्सा नहीं था.

जून 2025 के आदेश में इस घोषणा-पत्र को परिशिष्ट-डी नाम दिया गया था. बाद के आदेशों में इसे परिशिष्ट-IV से बदल दिया गया, ताकि आवेदक अपना या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली मतदाता सूचियों से जोड़ने संबंधी जानकारी दे सकें. आयोग के अनुसार, इससे उन आवेदकों को सहूलियत मिल सकती थी, जिनके पास पिछले पुनरीक्षण से जुड़ी जानकारी उपलब्ध थी. जानकारी उपलब्ध न होने या न दिए जाने की स्थिति में आवेदक निर्धारित सहायक दस्तावेज जमा कर सकते थे.

सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया था कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी है और न ही खारिज किया है. अदालत ने यह पता लगाने के लिए मूल रिकॉर्ड की जाँच करने की बात कही थी कि फॉर्म में क्या बदलाव किए गए और किसने किए. निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में दोहराया है कि तीनों एसआईआर आदेशों के जरिए फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया.

विपक्ष की मांग और कानूनी सवाल

लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी सहित विपक्षी गठबंधन के 13 नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्र और समयबद्ध जाँच कराने की मांग की है. याचिकाकर्ताओं ने विवादित फैसलों से संबंधित फाइलें, बैठकों की कार्यवाही, टिप्पणियाँ और आपत्तियाँ अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने की मांग भी की है. इसके अलावा, उन्होंने सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने और जाँच पूरी होने तक एसआईआर पर रोक लगाने की माँग की है.

विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूचियों से पात्र मतदाताओं के नाम पर्याप्त सूचना और सुनवाई का अवसर दिए बिना हटाए जा सकते हैं. उसने नाम दोबारा जुड़वाने की प्रभावी व्यवस्था की कमी और ईसीआईनेट तथा ईआरओनेट जैसे चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकृत संचालन पर भी सवाल उठाए हैं.

विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे बिहार में एसआईआर की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दे रहे हैं. उनकी मांग है कि अदालत यह जाँच करे कि एसआईआर लागू करते समय लिए गए फैसले संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप थे या नहीं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है.

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