मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटाने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नया महाभियोग नोटिस लाने की तैयारी
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है. कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, कानूनी विशेषज्ञों की मदद से प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है और जल्द ही संयुक्त विपक्ष की ओर से नोटिस सौंपा जाएगा.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, यह घटनाक्रम उसकी इस रिपोर्ट के खुलासे के बाद सामने आया है, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में चुनाव आयोग के कई फैसलों पर आंतरिक रूप से लिखित आपत्तियां जताई थीं. त्रि-सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त 'बराबर वालों में प्रथम' होते हैं और नियमतः फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए.
नियुक्ति और संवैधानिक स्थिति
संविधान का अनुच्छेद 324 और 'मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023' चुनाव आयोग के कामकाज को नियंत्रित करते हैं. सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तीन सदस्यीय चयन समिति (प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री) की सिफारिश पर की जाती है. इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है. सीईसी को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान वेतन, भत्ते और सुविधाएं प्राप्त होती हैं.
कैसे हटाया जा सकता है मुख्य चुनाव आयुक्त को?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है. चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखने के लिए यह प्रक्रिया बेहद कठिन रखी गई है.
अनुच्छेद 124(4) के तहत हटाने के केवल दो ही आधार हो सकते हैं: एक साबित कदाचार, यानी भ्रष्ट आचरण, पद का दुरुपयोग या संवैधानिक कर्तव्यों का पालन न करना और दूसरा, शारीरिक या मानसिक रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा करने में अक्षम होना.
जानकारी के अनुसार, प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षरयुक्त नोटिस की आवश्यकता होती है. सदन के अध्यक्ष या सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. स्वीकार होने पर आरोपों की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाता है.
समिति द्वारा आरोप सिद्ध होने पर प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में अलग-अलग "उपस्थित और मतदान करने वाले" सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना अनिवार्य है. दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति पद से हटाने का औपचारिक आदेश जारी करते हैं.
भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया है. इससे पहले इसी साल मार्च में तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में गड़बड़ी और पक्षपात के आरोप लगाते हुए लोकसभा (130 सांसद) और राज्यसभा (63 सांसद) में नोटिस दिया था. हालांकि, अप्रैल में दोनों पीठासीन अधिकारियों ने बिना कोई कारण बताए इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था.

