अमेरिकी फेंटानिल संकट से सूरत का संबंध

अमरीकी अधिकारियों ने घातक दवा के उत्पादन के लिए मैक्सिकन कार्टेल को सामग्री की आपूर्ति करने से जुड़ी गुजरात के रसायन केंद्र (हब) से संबद्ध संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई की है. चीन द्वारा निर्यात पर सख्ती किए जाने के बाद इन कार्टेलों ने भारत का रुख किया है.

यूएस ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) के अनुसार, केवल 2 मिलीग्राम फेंटानिल — एक ऐसी मात्रा जो पेंसिल की नोक पर आ सकती है — किसी वयस्क की जान लेने के लिए काफी है. दिसंबर 2025 में अमरीका में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, वहां 70,000 से अधिक ड्रग ओवरडोज़ से मौतें हुईं. अधिकारियों का कहना है कि "लगभग 69% ओवरडोज़ मौतें सिंथेटिक ओपियोइड (कृत्रिम अफीम-आधारित ड्रग्स), विशेष रूप से अवैध रूप से बनाए गए फेंटानिल और उसके एनालॉग्स के कारण हुईं." यह हेरोइन से 50 गुना और मॉर्फिन से 100 गुना अधिक शक्तिशाली है. 18 से 44 वर्ष के अमरीकियों में यह आकस्मिक मृत्यु का मुख्य कारण बन चुका है.

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में पॉल जॉन और आशीष चौहान की रिपोर्ट के अनुसार, अमरीका में अवैध फेंटानिल उपयोग पर हो रही कार्रवाई का असर अब भारत के पश्चिमी तट तक पहुंच गया है. जांच एजेंसियों ने गुजरात के सूरत स्थित रसायन और दवा (फार्मास्युटिकल) उद्योग से जुड़ी संस्थाओं पर शिकंजा कसा है. चीन द्वारा फेंटानिल निर्माण में इस्तेमाल होने वाले मुख्य घटकों पर सख्त प्रतिबंध लगाने के बाद, भारत को उस आपूर्ति की कमी को पूरा करने वाले स्रोत के रूप में देखा जा रहा है.

हालांकि, फेंटानिल खुद एक अवैध दवा नहीं है; यह आधुनिक चिकित्सा के लिए एक आवश्यक दर्द निवारक दवा है. लेकिन भारत के नियामक ढांचे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्व अवैध रूप से फेंटानिल बनाने वाले रसायनों की तस्करी कर रहे हैं.

सूरत फाइल्स

अथोस केमिकल्स का मामला: गुजरात एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड (एटीएस) का 2025 का एक मामला सूरत स्थित 'अथोस केमिकल्स' के सतीशकुमार सुतारिया से जुड़ा है. जांचकर्ताओं का आरोप है कि सुतारिया और उनके सहयोगी युक्त मोदी ने फर्जी "एंड-यूज़र सर्टिफिकेट" बनाकर बड़ी मात्रा में ऐसे रसायन हासिल किए, जो फेंटानिल बनाने में काम आते हैं.

मैक्सिकन कार्टेल का जरिया: यह रसायन (जैसे एन-बोक-4-पाइपरिडोन, एनपीपी  और एएनपीपी) ग्वाटेमाला की एक कंपनी 'जे एण्ड सी इम्पोर्ट' को भेजे गए थे, जो मैक्सिकन ड्रग कार्टेल सिनालोआ के बिचौलिए से जुड़ी थी. 1 किग्रा एन-बोक-4-पाइपरिडोन से लगभग 1.8 किग्रा फेंटानिल तैयार हो सकता है, जो लगभग 9 लाख जानलेवा खुराकों के बराबर है.

अमरीकी प्रतिबंध और अदालती मामले: अप्रैल 2025 में अमरीकी वित्त विभाग (ओएफएसी) ने सुतारिया, मोदी और उनकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके अलावा, ब्रुकलिन की एक अमरीकी संघीय अदालत में सूरत के व्यवसायी भावेश लाठिया (रैक्सुटर केमिकल्स) ने 50 पाउंड से अधिक प्रीकर्सर रसायनों की तस्करी करने और सीमा शुल्क से बचने के लिए पार्सल पर "विटामिन सी" या "एंटासिड" का झूठा लेबल लगाने का अपराध स्वीकार किया. उन्हें 40 साल तक की जेल हो सकती है.

गुजरात का केमिकल इकोसिस्टम

भारत के कुल रसायन उत्पादन का लगभग 50% हिस्सा अकेले गुजरात (5,000 से अधिक रासायनिक इकाइयां और 3,000 फार्मा इकाइयां) से आता है. मुंद्रा और पीपावाव जैसे गहरे पानी के बंदरगाह मध्य अमरीका तक सीधी समुद्री पहुंच प्रदान करते हैं. इसी मजबूत औद्योगिक तंत्र का उपयोग गलत लोग अवैध व्यापार के लिए कर रहे हैं.

गुजरात केमिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. जैमिन वासा के अनुसार: "ग्राहक बिचौलियों या अलग-अलग कंपनियों के ज़रिए काम कर सकते हैं. कागज़ात पूरे लग सकते हैं, लेकिन रसायन का वास्तविक अंत-उपयोग हमेशा पारदर्शी नहीं होता. जो चीज़ें संदेह पैदा करती हैं, वे हैं — बहुत बड़े ऑर्डर, सामान्य व्यवसाय से मेल न खाने वाली खरीदारी और असामान्य भुगतान प्रक्रियाएं."

अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट और भारत की कार्रवाई

अमरीकी इंटेलिजेंस कम्युनिटी की 2025 एनुअल थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट में भारत को अवैध फेंटानिल प्रीकर्सर और पिल-प्रेसिंग उपकरण के स्रोत के रूप में चीन के बाद दूसरे स्थान पर रखा गया है. इंटरनेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड (आईएनसीबी) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के उत्तरार्ध में यूरोप में जब्त की गई एन-बोक-4-पाइपरिडोन की खेपों का स्रोत भारत था.

जनवरी 2025 में, भारत सरकार ने एनडीपीएस संशोधन आदेश 2025 के माध्यम से एन-बोक-4-पाइपरिडोन सहित फेंटानिल प्रीकर्सर रसायनों पर सख्त नियंत्रण लागू कर दिया. आईएनसीबी के ऑनलाइन सिस्टम के जरिए की गई एक समन्वित कार्रवाई में 3 टन रसायन की खेप को रोका गया, जिससे लगभग 1.4 से 3.3 टन फेंटानिल (70 करोड़ से 1.6 अरब जानलेवा खुराकें) बनाई जा सकती थी.

बहरहाल, सीमा पार अवैध व्यापार पर नज़र रखने वाले जांचकर्ताओं के लिए अब यह सवाल नहीं है कि अवैध फेंटानिल से कितनी तबाही हुई है, बल्कि सवाल यह है कि क्या नियामक संस्थाएं इस बहु-अरब डॉलर की रासायनिक आपूर्ति श्रृंखला की गति का मुकाबला कर सकती हैं या नहीं?

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