सावरकर के बारे में परपोते की परेशान करने वाली स्वीकारोक्तियां; राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की सुनवाई रोकने की मांग

सावरकर शोधकर्ता पंकज फड़नीस ने पुणे की विशेष एमपी/एमएलए अदालत द्वारा याचिका खारिज करने और 20,000 रुपये का जुर्माना लगाने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है. उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे सावरकर मानहानि मामले की सुनवाई पर रोक लगाने, एक न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त करने और साक्ष्यों के दायरे को सीमित करने की मांग की है.

'लाइव लॉ' के अनुसार, फड़नीस का कहना है कि सावरकर का अनादर करना संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उनके 'अर्थपूर्ण जीवन के अधिकार' का उल्लंघन है.  उनका तर्क है कि अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि सावरकर "कायर" थे या "वीर", क्योंकि किसी स्वतंत्रता सेनानी के योगदान का न्यायिक निर्धारण नहीं हो सकता. यह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसने सर्वसम्मति से संसद में उनका चित्र स्थापित किया है.  फड़नीस का यह आवेदन उनकी एक पुरानी जनहित याचिका का हिस्सा है.

दरअसल, राहुल गांधी की कानूनी टीम द्वारा की जा रही जिरह के दौरान शिकायतकर्ता सत्यकी (सावरकर के पोते) ने कई ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार किए हैं. मसलन, सावरकर ने ब्रिटिश हिरासत के दौरान 10 दया याचिकाएं दायर की थीं, जबकि भगत सिंह और अन्य कभी पीछे नहीं हटे. सावरकर को "स्वातंत्र्यवीर" की उपाधि किसी सरकार द्वारा नहीं दी गई थी. नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे आरएसएस के सक्रिय सदस्य थे और नाथूराम ने महात्मा गांधी की हत्या की थी.

यह मानहानि मुकदमा राहुल गांधी द्वारा सावरकर पर की गई कथित टिप्पणी के खिलाफ सत्यकी द्वारा दायर किया गया था. हालांकि, जिरह के दौरान सामने आए इन ऐतिहासिक खुलासों से परेशान होकर सत्यकी के वकीलों ने कार्यवाही में तेजी लाने की मांग की है. फड़नीस ने इन बयानों की खबरें पढ़ने के बाद ही मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश की थी, जिसका राहुल गांधी और सत्यकी दोनों के वकीलों ने विरोध किया था.

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