भारत के शिक्षा संकट के बीच विदेश में पढ़ रहे केंद्रीय मंत्रियों के बच्चे
देश में प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ियों, पेपर लीक, भर्ती घोटालों और परिणामों में देरी ने एक बार फिर भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. राष्ट्रीय पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा (नीट) समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आई अनियमितताओं के बाद छात्रों और अभिभावकों का आक्रोश बढ़ा है. इसी बीच एक नई बहस ने जोर पकड़ा है कि जब देश की शिक्षा व्यवस्था लगातार संकटों से घिरी है, तब केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों के बच्चे विदेशों में पढ़ाई क्यों कर रहे हैं.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के विश्लेषण से पता चलता है कि केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों के 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के जिन 21 बच्चों के बारे में जानकारी उपलब्ध है, उनमें से 15 ने विदेशी विश्वविद्यालयों से डिग्री हासिल की है या वर्तमान में विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं. केवल एक बच्चे ने भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त की, जबकि पांच के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है. यह आयु वर्ग इसलिए चुना गया क्योंकि इन छात्रों ने वर्ष 2014 के बाद, यानी नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में, उच्च शिक्षा प्राप्त की.
विदेश में पढ़ाई करने वाले मंत्रियों के बच्चों की सूची में कई प्रमुख नाम शामिल हैं. विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पुत्र अर्जुन जयशंकर ने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से स्नातक किया. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बेटी वांगमयी परकाला ने अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री हासिल की. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के पुत्र ध्रुव गोयल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की, जबकि उनकी बेटी राधिका गोयल ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ सैन डिएगो से पीएचडी की.
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के दोनों बच्चों ने यूनाइटेड किंगडम में शिक्षा प्राप्त की. कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के दोनों पुत्रों ने अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से पढ़ाई की. स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के पुत्र ने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से कानून की पढ़ाई की. संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के दोनों बच्चों ने भी विदेशी विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की. इसके अलावा पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के परिवार भी इस सूची में शामिल हैं.
शिक्षा कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भरोसे से जुड़ा सवाल भी है. कर्नाटक के शिक्षा कार्यकर्ता निरंजनाराध्य वीपी का कहना है कि जिन लोगों के पास आर्थिक संसाधन हैं, वे अपने बच्चों को विदेश भेज सकते हैं, लेकिन अधिकांश भारतीय छात्रों के लिए ऐसा करना संभव नहीं है. ऐसे में सरकार को यह बताना चाहिए कि देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं.
बिहार के शिक्षा कार्यकर्ता अनिल कुमार राय का मानना है कि लगातार होने वाले पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएं और रोजगार को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने छात्रों का भरोसा कमजोर किया है. उनका कहना है कि जब परीक्षा प्रणाली और नौकरी की प्रक्रिया दोनों पर सवाल उठते हों, तो सक्षम परिवार अपने बच्चों के लिए विदेश को बेहतर विकल्प मानने लगते हैं.
आंकड़े भी इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं. वर्ष 2001 में लगभग 22 लाख भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे थे. वर्ष 2011 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 40 लाख हो गई और वर्ष 2022 तक यह करीब 69 लाख तक पहुंच गई. दूसरी ओर भारत आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों से ठहराव देखने को मिला है. विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालयों में अनुसंधान, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के लिए पर्याप्त निवेश नहीं होने से भी भारतीय उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई है.
हालांकि सभी मंत्रियों के परिवारों की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. कुछ मंत्री अविवाहित हैं, कुछ के बच्चे अभी स्कूल में पढ़ रहे हैं और कई मामलों में परिवार से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है.
इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यालय ने स्पष्टीकरण दिया है कि उनकी बेटी नैमिषा पहले ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में एलएलबी की छात्रा थीं. बाद में उन्हें एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत एक वर्ष के लिए अमेरिका की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी में एलएलएम करने का अवसर मिला.
इन तथ्यों ने शिक्षा व्यवस्था पर नई बहस को जन्म दिया है. सवाल केवल इतना नहीं है कि मंत्रियों के बच्चे कहां पढ़ते हैं, बल्कि यह भी है कि यदि देश के नीति-निर्माता स्वयं विदेशी विश्वविद्यालयों को प्राथमिकता देते हैं, तो भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को विश्वस्तरीय बनाने के दावों पर किस हद तक भरोसा किया जा सकता है. यही प्रश्न आज शिक्षा व्यवस्था और सरकार, दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है.

