भारत में मातृत्व अवकाश अधिकार तो है, लेकिन अधिकांश महिलाओं के लिए अब भी एक अधूरा वादा

भारत में मातृत्व अवकाश को कानून और संविधान दोनों के तहत महिलाओं का अधिकार माना गया है. सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए यह स्पष्ट किया है कि मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि गरिमा, स्वास्थ्य और समानता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है. इसके बावजूद हकीकत यह है कि देश की अधिकांश कामकाजी महिलाओं तक यह अधिकार आज भी नहीं पहुंच पाया है. विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश और उससे जुड़ी सुविधाएं अब भी लगभग काल्पनिक हैं.

‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, इस स्थिति की सबसे बड़ी मिसाल आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, जो देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं. भारत में लगभग 10 लाख आशा कार्यकर्ता और 13 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कार्यरत हैं. ये गर्भवती महिलाओं की देखभाल, टीकाकरण, स्वास्थ्य सर्वेक्षण और गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का काम करती हैं. लेकिन विडंबना यह है कि इन्हें न नियमित वेतन मिलता है, न मातृत्व अवकाश, न स्वास्थ्य बीमा और न ही भविष्य निधि जैसी सामाजिक सुरक्षा.

उत्तर प्रदेश के कानपुर की एक आशा कार्यकर्ता ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान उन्हें अंतिम समय तक काम करना पड़ा. यदि वे काम नहीं करतीं तो उन्हें भुगतान नहीं मिलता. प्रसव के बाद भी जल्द काम पर लौटना मजबूरी होती है क्योंकि उनकी आय पूरी तरह प्रोत्साहन राशि पर निर्भर करती है. कई बार वेतन और प्रोत्साहन राशि भी महीनों की देरी से मिलती है.

मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दत्तक माताओं को भी मातृत्व अवकाश का अधिकार दिया. अदालत ने सामाजिक सुरक्षा संहिता की उस शर्त को असंवैधानिक बताया, जिसमें केवल तीन महीने से कम आयु के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को ही यह लाभ मिलता था. अदालत ने कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल प्रसव के बाद शारीरिक आराम नहीं, बल्कि बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव और उसकी देखभाल भी है. साथ ही केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश पर भी विचार करने की सलाह दी.

भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत पात्र महिलाओं को भुगतान सहित अवकाश का अधिकार दिया गया है. वर्ष 2017 में इसमें संशोधन कर पहले दो बच्चों के लिए अवकाश 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया. दत्तक और सरोगेसी से मां बनने वाली महिलाओं को भी कुछ शर्तों के साथ इसका लाभ दिया गया. लेकिन यह कानून केवल उन संस्थानों पर लागू होता है, जहां कम से कम 10 कर्मचारी कार्यरत हों.

यहीं सबसे बड़ी समस्या है. भारत की लगभग 93.5 प्रतिशत महिला श्रमिक इस कानून के दायरे से बाहर हैं क्योंकि वे छोटे प्रतिष्ठानों, कृषि, घरेलू कामकाज, निर्माण क्षेत्र या असंगठित रोजगार में कार्यरत हैं. कानून में यह भी शर्त है कि महिला ने प्रसव से पहले 12 महीनों में कम से कम 80 दिन काम किया हो. अस्थायी, मौसमी और गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाली महिलाओं के लिए यह शर्त पूरी करना अक्सर संभव नहीं होता.

एक अध्ययन में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के ग्रामीण एवं अर्धशहरी क्षेत्रों की 120 महिलाओं से बातचीत की गई. इनमें 72 प्रतिशत महिलाओं को मातृत्व लाभ योजनाओं की जानकारी ही नहीं थी. लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं ने आर्थिक मजबूरी के कारण गर्भावस्था के दौरान काम जारी रखा और 65 प्रतिशत महिलाएं प्रसव के दो सप्ताह के भीतर ही दोबारा काम पर लौट आईं. प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का लाभ भी केवल 20 प्रतिशत पात्र महिलाओं तक पहुंच पाया. बाकी महिलाएं दस्तावेजों की कमी, आधार संबंधी त्रुटियों और प्रशासनिक देरी के कारण वंचित रह गईं.

गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति और भी कठिन है. कई मामलों में गर्भावस्था के दौरान बिना वेतन छुट्टी लेने पर उनके खाते निष्क्रिय कर दिए गए या रोजगार समाप्त कर दिया गया. अदालतों ने कुछ मामलों में महिलाओं के पक्ष में फैसले दिए, लेकिन इससे व्यवस्था में व्यापक बदलाव नहीं आया.

यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार दुनिया भर में 70 करोड़ से अधिक महिलाएं बिना भुगतान वाले देखभाल कार्यों के कारण श्रम बाजार से बाहर हैं. नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों में लंबी अवधि का भुगतान सहित मातृत्व और साझा पितृत्व अवकाश उपलब्ध है, जिससे महिलाओं के करियर पर मातृत्व का नकारात्मक प्रभाव कम होता है.

भारत में जिन महिलाओं को कानून के तहत मातृत्व अवकाश का अधिकार प्राप्त है, उन्हें भी कई बार भेदभाव का सामना करना पड़ता है. कई मामलों में गर्भावस्था के कारण नौकरी से निकाला गया, मातृत्व अवकाश देने से इनकार किया गया या अवकाश के बाद पद समाप्त होने का हवाला देकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया. अदालतों ने ऐसे मामलों में बार-बार हस्तक्षेप कर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की है.

भारत में मातृत्व अवकाश का कानून मौजूद है, लेकिन इसकी संरचना ऐसी है कि अधिकांश कामकाजी महिलाएं स्वतः ही इसके दायरे से बाहर रह जाती हैं. निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और गिग अर्थव्यवस्था से जुड़ी महिलाएं आज भी इस अधिकार से वंचित हैं. इसलिए वास्तविक चुनौती कानून बनाने की नहीं, बल्कि उसे सभी कामकाजी महिलाओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की है. तभी मातृत्व को सचमुच महिलाओं का सार्वभौमिक अधिकार बनाया जा सकेगा.

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