लात-घूंसे, थप्पड़ और मारपीट: दिल्ली पुलिस की बस में हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप, नाबालिगों को भी पीटा
‘आर्टिकल-14’ में बेतवा शर्मा और सबा गुरमत लिखती हैं कि 11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश प्रकाश के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वाले लोगों ने पुलिस पर हिरासत के दौरान मारपीट करने, नाबालिगों को पीटने, मोबाइल फोन जब्त करने और भोजन, पानी व चिकित्सा सहायता से वंचित रखने का आरोप लगाया है. चार प्रत्यक्षदर्शियों ने इस संबंध में अपनी आपबीती साझा की. दिल्ली पुलिस से फोन और ईमेल के जरिए प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला था.
नरेगा संघर्ष मोर्चा के 30 वर्षीय कार्यकर्ता अर्जुन उन्नीकृष्णन ने आरोप लगाया कि मध्य दिल्ली में हिरासत में लिए जाने के बाद पुलिसकर्मियों ने बस के भीतर उन्हें चेहरे, पीठ और निजी अंगों पर लात-घूंसों से पीटा. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) के 20 वर्षीय सदस्य विशाल कुमार ने भी मारपीट का आरोप लगाया. उनके मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने उनके घुटने पर प्रहार किया, कोहनियों से चोट पहुंचाई और चेहरे तथा पेट पर मुक्के मारे.
प्रदर्शन रोकने के लिए व्यापक पुलिस तैनाती
रिपोर्ट के अनुसार, 10 और 11 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहे लोगों को रोकने के लिए दिल्ली में बड़े पैमाने पर पुलिस तैनाती की गई. पहले दिन प्रदर्शन स्थल के आसपास बैरिकेडिंग की गई, इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगाने वाले आदेश लागू किए गए. प्रदर्शनकारियों के वैकल्पिक स्थानों पर जुटने की कोशिश करने पर भी उन्हें हिरासत में लिया गया. इनमें महिलाएं और पत्रकार भी शामिल थे.
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इंटरनेट सेवाएं बहाल हुईं और दूसरे दिन लोगों की आवाजाही पर लगी पाबंदियों में कुछ ढील मिली. हालांकि, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को निर्धारित स्थल तक पहुंचने से रोकना जारी रखा.
बस के भीतर मारपीट और मोबाइल फोन की जांच
अर्जुन उन्नीकृष्णन और विशाल कुमार के मुताबिक, पुलिस ने उन्हें कनॉट प्लेस में हिरासत में लिया और सड़क पर कई कतारों में बैठा दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने कुछ लोगों, जिनमें किशोर भी शामिल थे, से मोबाइल फोन मांगे. एक किशोर के फोन देने से इनकार करने पर कथित तौर पर उसे थप्पड़ मारे गए. बाद में उसका फोन और पासवर्ड ले लिया गया. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनके मोबाइल फोन से तस्वीरें भी मिटा दीं.
दोनों के अनुसार, इसके बाद उन्हें एक ऐसी पुलिस बस में ले जाया गया, जिसमें छोटे-छोटे खानों में लोगों को रखा गया था. उनके अनुमान के मुताबिक, बस में लगभग 50 से 60 लोग थे. चार से पांच पुलिसकर्मियों पर आरोप है कि उन्होंने 10 से 15 लोगों के साथ मारपीट की और गाली-गलौज की. प्रदर्शनकारियों ने बताया कि उनके खंड में चार नाबालिग भी थे, जिन्हें कथित तौर पर पीटा गया. विशाल कुमार के अनुसार, एक व्यक्ति का हाथ इतनी बुरी तरह घायल हुआ कि उसकी हड्डी टूट गई.
23 वर्षीय तरंग बलानी ने भी बस में हिंसा होने की पुष्टि की और कहा कि उन्हें तथा एक नाबालिग को पीटा गया. दिल्ली के वकील गौरव साइकिलवाला ने दावा किया कि उन्होंने छावला थाने में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन थाना प्रभारी ने शिकायत लेने से इनकार कर दिया. इसके बाद शिकायत ईमेल से भेजी गई.
दूरदराज के हिरासत केंद्रों में ले जाने का आरोप
प्रदर्शनकारियों के अनुसार, पुलिस उन्हें एक थाने से दूसरे थाने ले जाने के बाद दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के पंडवाला खुर्द स्थित हिरासत केंद्र ले गई, जो कनॉट प्लेस से लगभग 40 किलोमीटर दूर है. उन्होंने आरोप लगाया कि वहां अंधेरा था, मोबाइल नेटवर्क कमजोर था और उन्हें भोजन-पानी नहीं दिया गया. घायलों को भी शुरुआत में चिकित्सा सहायता नहीं मिली और रिहाई के समय के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई.
अर्जुन उन्नीकृष्णन ने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों ने नाबालिगों और घायलों की स्थिति को लेकर सामूहिक रूप से आवाज उठाई. इसके बाद प्राथमिक उपचार की व्यवस्था की गई. सोशल मीडिया पर हिरासत की खबर फैलने के बाद वकील केंद्र पहुंचे और लोगों की रिहाई के लिए प्रयास करने लगे. कुछ प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि उनके मोबाइल फोन तुरंत वापस नहीं किए गए.
रिपोर्ट में समयक अलोन नामक 28 वर्षीय क्रिएटिव डायरेक्टर का बयान भी शामिल है, जिन्हें कनॉट प्लेस से एक दूसरी बस में ले जाया गया था. उन्होंने बताया कि बस में महिला प्रदर्शनकारी और एक नाबालिग भी थे. उनके मुताबिक, बस कई इलाकों से गुजरते हुए द्वारका एक्सप्रेसवे के रास्ते एक ग्रामीण क्षेत्र में पहुंची और अंततः उन्हें नजफगढ़ के पास एक हिरासत केंद्र ले जाया गया.
अलोन ने आरोप लगाया कि बस को छावला थाने के पास लगभग 40 मिनट तक रोका गया, लेकिन किसी को उतरने नहीं दिया गया. उन्होंने बताया कि वहां अंधेरा था, लोगों के पास पानी नहीं था और शौचालय की जरूरत तथा मासिक धर्म के दौरान सैनिटरी पैड की मांग करने वाली एक युवती की गुहार पर भी ध्यान नहीं दिया गया.
ये आरोप प्रदर्शनकारियों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर आधारित हैं. खबर प्रकाशित होने तक दिल्ली पुलिस की ओर से इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई थी.

