श्रवण गर्ग | जनता अब तमाशबीन नहीं, भागीदार है
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ दिल्ली में राहुल गांधी के नेतृत्व में हुए मार्च, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर चर्चा की. बातचीत में गर्ग ने इस घटनाक्रम को केवल विपक्ष के प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि राजनीति में जनता की बढ़ती भागीदारी के संकेत के तौर पर देखा. उनके अनुसार, अब विपक्ष जनता को अपने साथ जोड़ने के बजाय जनता के दबाव में अपनी भूमिका तय करने को मजबूर हो रहा है.
श्रवण गर्ग ने दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों के सड़कों पर उतरने को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना बताया. उन्होंने कहा कि कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और बैरिकेडिंग के बीच प्रदर्शनकारियों का जुटना नागरिकों के साहस को दर्शाता है. उनके मुताबिक, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और अन्य विपक्षी नेताओं का एक साथ आना विपक्षी एकजुटता का नया संकेत है. उन्होंने इस बदलाव को इन शब्दों में व्यक्त किया, “जनता अब तमाशबीन नहीं है, वह भागीदार है.” गर्ग का मानना है कि जनता का दबाव विपक्ष की राजनीति और उसकी रणनीति को प्रभावित कर रहा है.
बातचीत में चुनाव आयोग, राष्ट्रपति और न्यायपालिका की भूमिका प्रमुखता से उठी. गर्ग ने राहुल गांधी के कदमों को संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष अपनी मांगें रखने की कोशिश के रूप में देखा. उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची से जुड़े विवादों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन मामलों का समाधान पारदर्शी प्रक्रिया और समयबद्ध कार्रवाई के जरिए होना चाहिए. उन्होंने चुनाव आयोग के नेतृत्व में बदलाव की मांग को व्यापक संस्थागत जवाबदेही से भी जोड़ा.
गर्ग ने मीडिया की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणी की. उनके अनुसार, हालिया घटनाक्रम ने समाचार माध्यमों की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर बहस को फिर से सामने ला दिया है. उन्होंने राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारों के सामने सत्ता से जुड़े सवाल उठाने की चुनौती भी इस राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा है. उनके विचार में, लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी सत्ता और विपक्ष, दोनों से सवाल पूछना है.
कांग्रेस के भविष्य पर चर्चा करते हुए गर्ग ने कहा कि पार्टी के संगठन को लेकर उठने वाले सवालों के बीच जनता का समर्थन उसकी राजनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकता है. हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी दल में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए चुनौती बन सकता है. इसी संदर्भ में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर आत्ममंथन की जरूरत बताई. उनका तर्क था कि भाजपा को कुछ नेताओं और सरकार की कार्यशैली से अलग करके देखने की आवश्यकता है.
बातचीत के अंत में गर्ग ने कहा कि यह संघर्ष लंबा चल सकता है और इसके राजनीतिक प्रभाव विभिन्न राज्यों में भी दिखाई दे सकते हैं. उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों को लोकतांत्रिक संस्थाओं, मीडिया और राजनीतिक दलों की जवाबदेही की परीक्षा के रूप में प्रस्तुत किया. उनके अनुसार, आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि संस्थाएं अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां किस तरह निभाती हैं और राजनीतिक नेतृत्व जनता के सवालों का कितना जवाब देता है.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

