संभल हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी पर लगा एनएसए रद्द किया, शक्ति का ‘अवैध रूप से प्रयोग’ करने के लिए यूपी सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना

अरात्रिका भौमिक की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 सितंबर, 2026) को नवंबर 2024 की संभल हिंसा के सिलसिले में एक व्यक्ति के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत पारित निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि हिरासत की शक्ति का "अवैध रूप से प्रयोग" किया गया था. इसके लिए अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना भी लगाया.

जस्टिस दीपांकर दत्ता और शील नागू की पीठ ने संभल के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अक्टूबर 2025 में पारित हिरासत आदेश को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अधिकारियों ने बंदी को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने से पहले प्रासंगिक सामग्री पर विचार नहीं किया था.  अदालत ने यह भी माना कि अधिकारियों द्वारा जिस इकबालिया बयान पर भरोसा किया गया था, वह अपने आप में निवारक हिरासत को उचित नहीं ठहरा सकता. पीठ ने खुली अदालत में फैसले के मुख्य हिस्से को सुनाया.

यह फैसला मुल्ला अफरोज द्वारा दायर एक याचिका पर आया, जिसे 24 नवंबर, 2024 को संभल में शाही जामा मस्जिद के अदालत द्वारा आदेशित सर्वेक्षण के दौरान भड़की हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. इन झड़पों में चार लोग मारे गए थे.

यह सर्वेक्षण संभल की एक दीवानी अदालत ने 19 नवंबर, 2024 को हिंदू याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान आदेशित किया था, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद का निर्माण एक मंदिर के ऊपर किया गया था.

अफरोज की ओर से पेश हुए अधिवक्ता दिव्येश प्रताप सिंह ने शीर्ष अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल को 17 जनवरी, 2025 को हिरासत में लिया गया था और फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने की धमकी देकर उसे अपराध कबूलने के लिए मजबूर किया गया था. उन्होंने तर्क दिया कि अफरोज के खिलाफ पुलिस का मामला पूरी तरह से पुलिस हिरासत में किए गए कथित कबूलनामे और उनके कहने पर कथित तौर पर बरामद की गई पॉइंट32-बोर की पिस्तौल पर टिका था. सिंह ने फोरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए आगे कहा कि जिस व्यक्ति की हत्या का आरोप अफरोज पर था, उसे पॉइंट32-बोर के हथियार (जो कथित तौर पर उनकी निशानदेही पर बरामद हुआ था) के बजाय पॉइंट315-बोर के आग्नेयास्त्र से घातक चोटें आई थीं.

जब अफरोज हिरासत में थे, तब संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), 1980 की धारा 3(2) लागू की, और 13 अक्टूबर, 2025 को उनकी निवारक हिरासत का आदेश दिया. राज्य और केंद्र सरकारों को दिए गए उनके बाद के प्रतिवेदनों (अपीलों) को खारिज कर दिया गया.

उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 नवंबर, 2025 को हिरासत आदेश की पुष्टि की, और निर्देश दिया कि अफरोज 12 अक्टूबर, 2026 तक निवारक हिरासत में रहें. इसके बाद अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया. उच्च न्यायालय ने 8 जून, 2026 को उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

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