पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह का गंभीर आरोप: कहा- ज्ञानेश कुमार और उनके ‘आका’ कानून का उल्लंघन कर रहे हैं

पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और बिहार के आरा से पूर्व सांसद आर.के. सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर देश की मतदाता सूची से करोड़ों नाम अवैध रूप से हटाने का गंभीर आरोप लगाया है. उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2003 के बाद निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) द्वारा जोड़े गए मतदाताओं के नाम बिना किसी जांच, कानूनी आधार या कारण बताओ नोटिस जारी किए हटा दिए गए हैं.

अमित भेलारी की रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर देशवासियों के नाम जारी एक खुले पत्र में पूर्व आईएएस अफसर, जो मोदी सरकार में मंत्री भी रहे हैं, ने देश के लोकतंत्र पर मंडराते खतरे की चेतावनी दी. सिंह ने कहा, "क्या आप चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे? तो फिर आपको यह समझना होगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके आका तथाकथित एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) में क्या कर रहे हैं. वे कानून का उल्लंघन कर रहे हैं." उन्होंने विपक्षी दलों से आह्वान किया कि जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्त इस्तीफा नहीं दे देते, तब तक उन्हें सभी भावी चुनावों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए.

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के उल्लंघन के आरोप

आर.के. सिंह ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट), 1951 की धाराओं का विस्तार से विश्लेषण करते हुए आयोग की कार्रवाई को असंवैधानिक ठहराया:

धारा 21 का उल्लंघन: इस कानून के तहत विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) केवल विशेष परिस्थितियों में और लिखित कारणों के आधार पर किसी विशिष्ट क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र में ही किया जा सकता है. पूरे देश में एक साथ गहन पुनरीक्षण लागू करना कानूनन गलत है.

अपील प्रक्रिया और पुरानी सूची का उपयोग: कानूनन, जब तक हटाये गए नामों के खिलाफ प्रस्तुत सभी अपीलों का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक पुरानी मतदाता सूची ही प्रभावी रहनी चाहिए. इसके विपरीत, लंबित अपीलों के बावजूद छांटी गई नई सूचियों के आधार पर चुनाव संपन्न कराए गए.

धारा 22 और न्यायिक मिसालें: किसी मतदाता का नाम हटाने का अधिकार केवल ईआरओ के पास है, वह भी उचित जांच और सुनवाई का मौका देने के बाद. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले लाल बाबू हुसैन एवं अन्य बनाम निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (1995) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि नागरिकता या योग्यता सिद्ध करने का भार मतदाता पर नहीं, बल्कि आपत्ति दर्ज कराने वाले या जांच अधिकारी पर होता है.

फॉर्म 6, 7 और युवाओं को रोकने की साजिश

पूर्व गृह सचिव ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने नियमों के विरुद्ध जाकर फॉर्म 6 में एक नया 'परिशिष्ट' जोड़ दिया, जिसे दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों ने खारिज कर दिया था. बहुमत के फैसले के खिलाफ लिया गया यह निर्णय स्वयं आयोग के नियमों का उल्लंघन है.

इस नए परिशिष्ट के तहत 18 वर्षीय नए आवेदकों से 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता के क्रम संख्या (सीरियल नंबर) की मांग की जा रही है. 2026 में किसी सामान्य या गरीब युवा के लिए 23 साल पुरानी सूची खोजना लगभग असंभव है. उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा जानबूझकर युवा मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के लिए किया गया है. क्योंकि भाजपा को पता है कि युवा मतदाता उसको वोट नहीं देगा.

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ईआरओ द्वारा वैध पाए गए 16 लाख मतदाताओं के नामों को केवल इसलिए रोक दिया गया क्योंकि उन पर संदिग्ध आपत्तियां (फॉर्म 7) दर्ज कराई गई थीं. जांच के दौरान इनमें से 90% से अधिक मतदाता पूर्णतः वैध पाए गए.

गरीबों पर मार और राजनीतिक प्रभाव

आर.के. सिंह के अनुसार, "तार्किक विसंगति" के नाम पर उन परिवारों को निशाना बनाया गया जहां पिता और बच्चे की आयु में 15 वर्ष से कम का अंतर दर्ज था. भारत के ग्रामीण और गरीब इलाकों में आज भी अस्पताल में जन्म न होने के कारण सटीक दस्तावेज नहीं होते.

इस प्रक्रिया के तहत अब तक लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 13% है. और अभी एसआईआर का काम पूरा नहीं हुआ है. 2024 के आम चुनावों में एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच कुल मतों का अंतर मात्र 3% था. इसलिए इन कटौतियों का चुनाव पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने कहा कि एनडीए के खिलाफ वोट देने वाले बूथों से मतदाताओं को काटने के लिए केंद्रीयकरण का उपयोग किया जा सकता है और पूछा: "क्या यही हुआ है?" उन्होंने कहा कि 26 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में उनके द्वारा सूचीबद्ध अवैधताओं की पुष्टि की गई है.

विपक्षी दलों से एकजुटता और कड़े कदम उठाने की अपील

सिंह ने विपक्ष से एकजुट होने का आग्रह किया और कहा कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाना व्यर्थ होगा, क्योंकि उनके पास संख्या बल नहीं है.

सिंह ने कहा, "सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना चाहिए और कहना चाहिए कि वे तब तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेंगे जब तक कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं दे देते और उनके उत्तराधिकारियों का चयन पिछली चयन प्रणाली के अनुसार न हो, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान न्यायाधीश शामिल हों. जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित रहने के दौरान चुनाव कराए गए, उन्हें रद्द किया जाना चाहिए और नए सिरे से चुनाव कराए जाने चाहिए. और मतदान ईवीएम से नहीं बल्कि मतपत्रों से कराया जाना चाहिए क्योंकि अभी तक ऐसा कोई इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम नहीं बनाया गया है जिसे हैक न किया जा सके."

सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर फैसले ने उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल किया है और यह आपातकाल को बरकरार रखने वाले फैसले के समान "कुख्यात" था. उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयुक्तों के चयन से जुड़े कानून की चुनौती पर सुनवाई में देरी से गलत संदेश जा रहा है. उन्होंने कहा, "आइए हम अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट हों."

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