परिसीमन : भाजपा के पास कोई बुरा विकल्प नहीं है, कांग्रेस के पास कोई अच्छा विकल्प नहीं है

16 अक्टूबर 2026 को राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन प्रस्तावों पर संसद में विधेयक पेश करने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने का अनुरोध किया.  अप्रैल के बाद से यह खड़गे की चौथी ऐसी मांग थी. इसके जवाब में 19 अक्टूबर को संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सरकार ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से बार-बार सहयोग मांगा है. हालांकि, सरकार के इस रुख से साफ है कि वह परिसीमन के सटीक खाके को सार्वजनिक चर्चा से दूर रखकर सीधे कानून लाने की योजना बना रही है.

वास्तविक मुद्दा: लोकसभा का आकार और वितरण

‘द हिंदू’ में वर्गीज़ के. जॉर्ज ने लिखा है कि परिसीमन की बहस में महिला आरक्षण अब कोई विवादित मुद्दा नहीं है. यह तय है कि अगली परिसीमन प्रक्रिया के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. असली बहस इस बात पर है कि लोकसभा में सीटों की कुल संख्या कितनी बढ़ेगी और राज्यों के बीच उनका बंटवारा कैसे होगा.

अप्रैल 2026 में सरकार ने 850 सीटों तक की विस्तारित लोकसभा में राज्यों के मौजूदा आनुपातिक प्रतिनिधित्व को बनाए रखने की बात कही थी. इससे कुल सीटों में 50% से अधिक की वृद्धि होगी. हालांकि, बाद में पेश किए गए विधेयकों में 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण की बात कही गई, जो सरकार के अपने वादे के विपरीत था.  विरोधाभास के कारण वे विधेयक पास नहीं हो सके.

अब मुख्य सवाल भाजपा के घोषित रुख को लेकर है: क्या सरकार 850 सीटों की सीमा के साथ राज्यों के मौजूदा अनुपात को बनाए रखने के लिए संविधान संशोधन लाएगी?

दूसरी ओर, कांग्रेस का प्रस्ताव है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या और राज्यों में उनका बंटवारा यथावत रहे. हालांकि, इसके लिए भी संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी. वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, 2027 की जनगणना के बाद राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण अनिवार्य है.

भाजपा की रणनीतिक गणना

यदि संविधान संशोधन नहीं होता है, तो मौजूदा 550 सीटों के ढांचे में ही पुनर्वितरण होगा. इससे अधिक आबादी वाले हिंदी भाषी राज्यों को भारी फायदा होगा, जिससे राजनीतिक रूप से भाजपा को सीधा लाभ मिल सकता है. फिर भी भाजपा सीटों की कुल संख्या बढ़ाने पर जोर क्यों दे रही है? वर्गीज़ को इसके पीछे तीन प्रमुख रणनीतिक कारण दिखते हैं: (एक)- राष्ट्रीय संतुलन और एकीकरण: प्रायद्वीपीय (दक्षिण) भारत को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेलना देश के एकीकरण और भाजपा की सर्व-भारतीय छवि के लिए नुकसानदेह हो सकता है. इसलिए पार्टी दक्षिण के राज्यों के अनुपात को बनाए रखने के बदले उत्तर के राज्यों में सीटों की निरपेक्ष संख्या बढ़ाने के पक्ष में है. (दो)- महिला आरक्षण का समायोजन: सीटों की संख्या 50% बढ़ाने से मौजूदा पुरुष सांसदों के अवसरों को प्रभावित किए बिना महिला आरक्षण लागू करना आसान हो जाएगा. (तीन)- सोशल इंजीनियरिंग: देश में जातिगत प्रतिनिधित्व की मांग बढ़ रही है. बड़ी लोकसभा से भाजपा को विभिन्न सामाजिक और जातीय समूहों को समायोजित करने के लिए अधिक गुंजाइश मिलेगी.

कुल मिलाकर, परिसीमन के मुद्दे पर भाजपा 'जीत-जीत' की स्थिति में है. यदि संविधान संशोधन पारित होता है, तो उसे सोशल इंजीनियरिंग के लिए अतिरिक्त सीटें मिलेंगी. यदि संशोधन गिर जाता है, तो मौजूदा सीटों का बड़ा हिस्सा उसके गढ़ माने जाने वाले उत्तर भारतीय राज्यों के खाते में चला जाएगा.

वर्गीज़ के मुताबिक, कांग्रेस भाजपा के संशोधन को रोकने को अपनी जीत मान सकती है, लेकिन उसके पास सीटों की संख्या और राज्यों के हिस्से दोनों को एक साथ बचाए रखने का कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं है. उसके सामने केवल दो ही रास्ते बचते हैं: पहला विकल्प: लोकसभा सीटों की संख्या बढ़े और राज्यों का आनुपातिक हिस्सा बना रहे (जिसके लिए भाजपा के संशोधन का समर्थन करना होगा). दूसरा विकल्प: सीटों की कुल संख्या न बढ़े, बल्कि नवीनतम जनगणना के आधार पर पुनर्वितरण हो. इससे केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के प्रतिनिधित्व में भारी कटौती होगी.

यदि दूसरा विकल्प लागू होता है, तो दक्षिण भारत के राजनीतिक नुकसान का ठीकरा भाजपा कांग्रेस और वामपंथियों पर फोड़ेगी, जबकि खुद उत्तर भारत में बढ़ी हुई सीटों का लाभ उठाएगी.
निचोड़ यह है कि परिसीमन के इस जटिल सियासी खेल में भाजपा के पास अपनी स्थिति मजबूत करने के दो बेहतर विकल्प मौजूद हैं, जबकि कांग्रेस के पास चुनने के लिए केवल दो कठिन और प्रतिकूल विकल्प ही बचते हैं.

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