‘टेलीग्राफ’ में जी. एस. मुदुर के रिपोर्ट के मुताबिक, स्विट्जरलैंड में एक भारतीय वैज्ञानिक ने एक छोटा वायरलेस इम्प्लांट विकसित करने में योगदान दिया है, जो बाहरी इंसुलिन या दवाओं के इस्तेमाल के बिना रक्त से अतिरिक्त ग्लूकोज हटाने में सक्षम है. स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ज्यूरिख (ईटीएच ज्यूरिख) के शोधकर्ताओं के अनुसार, मधुमेह से पीड़ित चूहों पर किए गए प्रयोगों में इस उपकरण ने 90 मिनट के भीतर ब्लड शुगर के स्तर को कम किया. छह सप्ताह तक चले परीक्षण के दौरान चूहों के शरीर का वजन और ट्राइग्लिसराइड का स्तर भी घटा. शोधकर्ताओं ने इस अवधि में कोई स्पष्ट प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया.
यह उपकरण त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित किया जाता है और स्मार्टफोन से जुड़े लगातार ग्लूकोज की निगरानी करने वाले सिस्टम के साथ काम करता है. जब ब्लड शुगर का स्तर पहले से निर्धारित सीमा से ऊपर जाता है, तो यह अपने आप सक्रिय हो जाता है और रक्त से अतिरिक्त ग्लूकोज हटाने की प्रक्रिया शुरू करता है. ग्लूकोज का स्तर निर्धारित सीमा तक पहुंचने पर इसकी गतिविधि रोकी जा सकती है, जिससे इस प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सकता है.
इस शोध में शामिल भारतीय वैज्ञानिक देबासिस मैती ईटीएच ज्यूरिख में पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता हैं. उन्होंने कोलकाता के रामकृष्ण मिशन विवेकानंद सेंटेनरी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की और कोयंबटूर स्थित भारथियार विश्वविद्यालय से पीएचडी की. वह छह साल पहले ईटीएच ज्यूरिख से जुड़े थे और प्रोफेसर मार्टिन फुसेनेगर की देखरेख में चयापचय संबंधी विकारों को नियंत्रित करने वाले इम्प्लांट विकसित करने पर काम कर रहे हैं.
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस उपकरण का आकार 26 मिलीमीटर लंबा, 14 मिलीमीटर चौड़ा और 5 मिलीमीटर मोटा है. इसमें ग्रेफाइट के आधार पर प्लैटिनम की परत वाले सोने के सूक्ष्म कण लगाए गए हैं. ये कण इलेक्ट्रोकैटलिस्ट की तरह काम करते हैं और ग्लूकोज को ग्लूकोनेट में बदलते हैं. ग्लूकोनेट ऐसा यौगिक है, जिसे शरीर गुर्दों के माध्यम से बाहर निकाल देता है. उपकरण को विद्युत ऊर्जा से सक्रिय करके ग्लूकोज हटाने की दर को नियंत्रित किया जा सकता है.
मैती के मुताबिक, प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में शोधकर्ताओं ने लगभग पांच लीटर तरल पदार्थ से ग्लूकोज हटाने की क्षमता प्रदर्शित की. यह मात्रा एक वयस्क के शरीर में मौजूद रक्त की सामान्य मात्रा के लगभग बराबर है. हालांकि, इस प्रयोग में इस्तेमाल किया गया उत्प्रेरक अभी 5 सेंटीमीटर लंबा, 5 सेंटीमीटर चौड़ा और 0.5 सेंटीमीटर मोटा है. इसलिए अगले चरण में उपकरण को और छोटा करने, वायरलेस चार्जिंग जैसी बिजली व्यवस्था जोड़ने और उसे लगातार ग्लूकोज की निगरानी करने वाले सिस्टम के साथ एकीकृत करने पर काम किया जाएगा.
इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के 2025 एटलस के अनुमान के अनुसार, दुनिया में लगभग 59 करोड़ वयस्क मधुमेह से पीड़ित हैं, जिनमें नौ करोड़ से अधिक भारत में रहते हैं. फिलहाल इसका उपचार मुख्य रूप से ब्लड शुगर या वजन कम करने वाली दवाओं पर निर्भर है. शोधकर्ताओं का कहना है कि दवाओं के दुष्प्रभाव, उनकी लागत, नियमित इस्तेमाल में कठिनाई और लंबे समय की सुरक्षा से जुड़े सवालों के कारण दवा-मुक्त उपचार का विकल्प उपयोगी हो सकता है.
हालांकि, मैती ने स्पष्ट किया कि अभी तक यह केवल प्रयोगशाला में चूहों पर अवधारणा को प्रमाणित करने वाला शोध है. मनुष्यों पर परीक्षण शुरू करने से पहले तकनीक में सुधार और उपकरण को छोटा करना जरूरी है. मैक्स हेल्थकेयर के एंडोक्रिनोलॉजी एवं डायबेटोलॉजी विभाग के अध्यक्ष अम्बरीश मित्तल ने इसे मधुमेह के उपचार की दिशा में एक नया विचार बताया, लेकिन यह भी कहा कि चूहों पर सफल रहने वाली तकनीक जरूरी नहीं कि मनुष्यों में भी उसी तरह काम करे.

