सोची-समझी तब्दीली: भारतीय लोकतंत्र में नागरिक से ‘लाभार्थी’ बनने का सफर

‘द टेलीग्राफ’ में यामिनी अय्यर का यह लेख भारतीय लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के बदलते स्वरूप का एक गंभीर और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. लेखिका दो अलग-अलग समयकालों और प्रशासनिक प्रवृत्तियों की तुलना करते हुए यह दिखाती हैं कि कैसे भारतीय नागरिक, जो कभी राज्य (सरकार) से अपने हक का दावा करने वाला एक 'अधिकार-संपन्न' व्यक्ति था, वह आज तकनीक और नई राजनीतिक परियोजनाओं के कारण एक मूक और आश्रित 'लाभार्थी' में बदल गया है.

लेख की शुरुआत साल 2006 में 'मनरेगा' के लागू होने के बाद हुए एक ऐतिहासिक प्रयोग से होती है. इस कानून के तहत 'सामाजिक अंकेक्षण' (सोशल ऑडिट) को अनिवार्य बनाया गया था. आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने नागरिक समाज के साथ मिलकर इसे संस्थागत रूप दिया.

सरकारी फाइलों से लैस होकर आम गरीब नागरिकों और श्रमिकों ने सरकारी रिकॉर्ड का जमीनी हकीकत से मिलान किया. तुरंत जवाबदेही सुनिश्चित की जाती थी. ऑडिट्स का समापन 'जनसुनवाई' में होता था, जहाँ भ्रष्ट अधिकारियों को पकड़ा जाता था और कई बार श्रमिकों की हड़पी गई मजदूरी तुरंत वापस दिलाई जाती थी. इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि इसने जाति, वर्ग या लिंग के भेदभाव से परे, समाज के सबसे शोषित वर्ग को एक समान मंच और 'अधिकारों को पाने का अधिकार' दिया. यहाँ नागरिक सरकार के सामने किसी कृपा या खैरात के 'याचक' के रूप में नहीं, बल्कि अपनी जवाबदेही मांगने वाले एक जागरूक और अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में खड़े थे.

लेखिका हाल के महीनों की घटनाओं का जिक्र करते हुए बताती हैं कि कैसे सरकार द्वारा नागरिकता साबित करने की बढ़ती मांग ने लोकतांत्रिक अधिकारों को खतरे में डाल दिया है. मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) ने नागरिकों को दस्तावेजों की एक बेहद जटिल और दुरूह होड़ में झोंक दिया है. एल्गोरिदम आधारित इस सत्यापन प्रक्रिया के कारण लोग अपने सबसे बुनियादी अधिकार—'वोट देने के अधिकार'—को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में इस प्रक्रिया की क्रूरता सामने आई, जहाँ लगभग 27 लाख मतदाताओं को 'तार्किक विसंगतियों' के नाम पर मताधिकार से वंचित कर दिया गया. लेखिका का आरोप है कि इस दस्तावेजी मांग का इस्तेमाल 'घुसपैठिया' की अवधारणा को सामान्य बनाने और बहुसंख्यकों की नज़र में मुस्लिम नागरिकों को 'संदिग्ध' श्रेणी में डालकर उन्हें हाशिए पर धकेलने के लिए किया जा रहा है.

हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस संकट को सामाजिक-आर्थिक अधिकारों तक बढ़ा दिया है. अब राज्य सरकारों द्वारा जन कल्याणकारी योजनाओं के लाभों को सीधे तौर पर एसआईआर (मतदाता सूची में नाम होने) से जोड़ा जा रहा है.

पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित सरकार और बिहार सरकार ने आदेश दिया कि जो लोग एसआईआर से बाहर हैं, उन्हें राशन या नकद जैसे सरकारी लाभ नहीं मिलेंगे. इसके परिणामस्वरूप बंगाल में 'अन्नपूर्णा योजना' के 26 लाख आवेदन खारिज हुए और बिहार में 50 लाख राशन कार्ड धारकों के नाम हटा दिए गए.

कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी ऐसी ही चेतावनियाँ दी हैं. यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई के अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि एसआईआर के आधार पर किसी को अन्य कल्याणकारी लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता, फिर भी व्यावहारिक रूप से न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकारों के इस कदम को रोकने वाली याचिकाओं पर गंभीरता दिखाई है. इसके कारण अब कल्याणकारी लाभ केवल उन लोगों का 'विशेशाधिकार' बनकर रह गए हैं, जिन्हें सरकार मतदाता बनने के योग्य मानती है.

लेखिका भारत में स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक कल्याणकारी सेवाओं के वितरण में आए बदलावों को रेखांकित करती हैं. शुरुआती दशकों की 'माई-बाप सरकार' के बाद, नागरिक समाज के संघर्षों से 'सूचना', 'काम' और 'भोजन' के कानूनी अधिकार मिले थे. लेकिन धीरे-धीरे इन अधिकारों की जगह तकनीक ने ले ली.

डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) जैसी तकनीकों ने बिचौलियों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को दरकिनार कर एक क्लिक पर पैसा सीधे बैंक खातों में पहुँचाना शुरू किया. इसका नकारात्मक पहलू यह हुआ कि जनकल्याण अब राज्य का नैतिक या कानूनी कर्तव्य नहीं रहा, बल्कि पार्टी नेताओं द्वारा दी जाने वाली एक 'व्यक्तिगत खैरात' या 'उपहार/गारंटी' बन गया. योजनाओं की ब्रांडिंग बड़े पैमाने पर नेताओं की तस्वीरों के साथ की जाने लगी.

लेखिका और राजनीतिक वैज्ञानिक नीलांजन सरकार ने इसे 'टेक्नो-पैट्रिमोनियलिज्म' का नाम दिया है. यह एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ लाभों की वैधता किसी अधिकार या संवाद से नहीं, बल्कि उस शीर्ष नेता के अधिकार और उदारता से तय होती है जो उसे बांट रहा है.

चुनावी दृष्टिकोण से यह मॉडल बेहद सफल है क्योंकि यह जनता के बीच सीधे तौर पर पूरा श्रेय पार्टी नेता को हस्तांतरित करता है, जिससे वोट बैंक मजबूत होता है. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि नेता जब चाहें, बिना किसी जवाबदेही के इन लाभों को वापस भी ले सकते हैं.

चुनाव जीतने के बाद अक्सर राज्य सरकारें अपने राजकोषीय (वित्तीय) बोझ को कम करने के लिए लाभों को एसआईआर से लिंक कर देती हैं, ताकि बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटकर खर्च कम किया जा सके और उनके बुनियादी अधिकारों पर भी सवाल उठाए जा सकें.

इस पूरी प्रक्रिया ने देश के सबसे कमजोर और गरीब वर्ग को बेबस बना दिया है. वर्ष 2024 के चुनावों के दौरान आगरा के एक दलित मतदाता का यह कथन इस कड़वी हकीकत को बयां करता है कि: "सरकार ने हमें देने वाला नहीं, बल्कि (अपने ही हक के लिए) मांगने वाला (याचक) बना दिया है."

यह लेख इस चेतावनी के साथ समाप्त होता है कि कल्याणकारी लाभों को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जोड़ना भारतीय नागरिकों को पूर्णतः 'लाभार्थी' में बदलने की दिशा में अंतिम कदम है. आज अधिकार की मांग करने वाला सक्रिय नागरिक इतिहास का हिस्सा बनता जा रहा है. लेखिका का मानना है कि यदि भारतीय लोकतंत्र को उसके वास्तविक रूप में पुनर्स्थापित करना है, तो हमें नागरिकों के भीतर 'अधिकारों के प्रति जागरूकता' और 'राज्य से जवाबदेही मांगने' की उसी पुरानी लोकतांत्रिक कल्पना को फिर से जीवित करना होगा

(यामिनी अय्यर ब्राउन यूनिवर्सिटी में सीनियर विजिटिंग फेलो हैं. यह उनके मूल लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

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