वन नेशन, वन इलेक्शन टूटी हुई व्यवस्था का समाधान नहीं

विजय केलकर और अजीत रानाडे का कहना है कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का प्रस्ताव भारतीय चुनाव व्यवस्था की मूल समस्याओं का समाधान नहीं करता. उनके अनुसार सरकार लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान (129वां संशोधन) विधेयक ला रही है, जिसके तहत नया अनुच्छेद 82ए जोड़ा जाएगा तथा अनुच्छेद 83 और 172 में संशोधन होगा. इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव करने से पहले इसके पक्ष में दिए जा रहे दावों की गंभीर जांच आवश्यक है.

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने इस प्रस्ताव के समर्थन में चार प्रमुख तर्क दिए हैं. पहला, चुनावी खर्च कम होगा. दूसरा, आचार संहिता के कारण होने वाले कथित नीतिगत ठहराव से राहत मिलेगी. तीसरा, सरकारी कर्मचारियों पर चुनाव का बोझ घटेगा. चौथा, इससे आर्थिक विकास तेज होगा. समिति ने एक शोध का हवाला देते हुए दावा किया है कि एक साथ चुनाव होने पर वास्तविक जीडीपी वृद्धि लगभग 1.5 प्रतिशत अंक अधिक होती है. लेकिन विजय केलकर और अजीत रानाडे का मानना है कि इस निष्कर्ष को ऐतिहासिक अनुभव की कसौटी पर परखना जरूरी है.

वे याद दिलाते हैं कि 1952 से 1967 तक, जब देश में एक साथ चुनाव होते थे, भारत की आर्थिक वृद्धि लगभग 3.5 प्रतिशत रही, जिसे "हिंदू दर की विकास दर" कहा जाता है. इसके विपरीत 2003 से 2011 के बीच, जब अलग-अलग समय पर राज्यों में चुनाव हो रहे थे, भारत ने 8 से 9 प्रतिशत की तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज की. ऐसे में केवल चुनावों के एक साथ होने को विकास का कारण मानना उचित नहीं है. उदारीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार, वैश्विक पूंजी प्रवाह और 1991 के आर्थिक सुधार जैसे बड़े कारकों की अनदेखी नहीं की जा सकती. जिस शोध का हवाला दिया गया है, उसमें भी विकास का संबंध अधिक सरकारी खर्च और बढ़ते राजकोषीय घाटे से दिखाई देता है, न कि किसी स्थायी आर्थिक सुधार से.

चुनावी खर्च कम होने के दावे पर भी दोनों लेखक सवाल उठाते हैं. उनके अनुसार सरकार का चुनावी खर्च उसके कुल बजट का 0.1 प्रतिशत भी नहीं है. वास्तविक खर्च राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाता है. चुनाव आयोग को सौंपे गए लेखा-जोखा के अनुसार उम्मीदवार आधिकारिक तौर पर अपनी निर्धारित खर्च सीमा का केवल लगभग आधा ही खर्च दिखाते हैं. इसका मतलब है कि चुनावी खर्च का बड़ा हिस्सा बेहिसाबी और काले धन के रूप में होता है. सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ के अनुमान के अनुसार केवल 2024 के लोकसभा चुनाव में ही एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का काला धन खर्च हुआ. इसलिए चुनाव एक साथ कराने से यह समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि केवल खर्च एक समय पर केंद्रित हो जाएगा.

आचार संहिता को लेकर भी उनका तर्क अलग है. अभी अलग-अलग राज्यों में चुनाव होने के कारण वर्ष के अलग-अलग समय में कुछ हिस्सों में आचार संहिता लागू रहती है. यदि पूरे देश में चुनाव एक साथ होंगे तो यही प्रतिबंध पूरे देश पर एक साथ लागू होगा. यानी विकास संबंधी घोषणाओं पर राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ रोक लगेगी. इसलिए इसे नीतिगत ठहराव का समाधान नहीं माना जा सकता.

संवैधानिक स्तर पर भी वे कई गंभीर प्रश्न उठाते हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने केसवानंद भारती मामले में स्पष्ट किया है कि संसदीय लोकतंत्र और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं. यदि कोई सरकार बहुमत खो देती है तो केवल चुनावी कैलेंडर बनाए रखने के लिए उसे सत्ता में बनाए रखना या राष्ट्रपति शासन लागू करना संसदीय व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं होगा. इसी तरह एक साथ चुनाव कराने के लिए कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाना और कुछ का घटाना भी मतदाताओं के जनादेश के साथ समझौता होगा.

उनका यह भी मानना है कि एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय दलों को लाभ और क्षेत्रीय दलों को नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है. ऐसे चुनावों में मतदाता अक्सर लोकसभा और विधानसभा दोनों में एक ही दल को चुनते हैं, जिससे स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय चुनावी विमर्श में दब सकते हैं. इसके अलावा पंचायतों और नगर निकायों के चुनाव राज्य चुनाव आयोगों के अधीन होते हैं. इसलिए यह व्यवस्था अपने आप में ओएनओई के तर्क को कमजोर करती है, क्योंकि स्थानीय चुनाव अलग से होते रहेंगे.

अंत में विजय केलकर और अजीत रानाडे कहते हैं कि भारतीय चुनाव व्यवस्था की वास्तविक समस्याएं असीमित चुनावी खर्च, काले धन का इस्तेमाल, राजनीति का अपराधीकरण, मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए धन वितरण और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग जैसी हैं. इनका समाधान राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता, खर्च की सख्त निगरानी, आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों पर प्रभावी रोक और पूरी तरह स्वतंत्र चुनाव आयोग जैसे सुधारों से किया जा सकता है. उनके अनुसार वन नेशन, वन इलेक्शन केवल चुनावों का कैलेंडर बदलता है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक कमियों को दूर नहीं करता.

(विजय केलकर पुणे इंटरनेशनल सेंटर के उपाध्यक्ष हैं, जबकि अजीत रानाडे इसी संस्थान में वरिष्ठ फेलो हैं. यह उनके मूल लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

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