छग के दूसरे युवा मज़दूर की भी मौत, बेहतर मजदूरी के लिए कश्मीर गए थे, आतंकियों ने पहचान पूछकर गोली मारी
छत्तीसगढ़ के दो गरीब युवा मजदूर—24 वर्षीय दीपक रात्रे और 25 वर्षीय भूपिंदर भैना—अपने परिवारों के बेहतर पालन-पोषण और अधिक मजदूरी की उम्मीद में 1,500 किलोमीटर दूर जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में एक ईंट भट्ठे पर काम करने गए थे. लेकिन शुक्रवार की शाम आतंकवादियों द्वारा उनकी निर्मम हत्या के साथ ही उनकी यह उम्मीद एक त्रासदी में बदल गई. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, आतंकवादियों ने झुग्गियों से बाहर निकालकर, उनसे नाम और धर्म पूछकर तथा उनके पहचान पत्रों की जाँच करने के बाद दोनों को बिल्कुल करीब से गोली मार दी.
पीड़ितों का पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्ष
दीपक रात्रे (शक्ति जिला, छत्तीसगढ़): दीपक जब महज चार साल के थे, तब उनके पिता ने खुदकुशी कर ली थी. इसके बाद उनका पालन-पोषण चाचाओं के संयुक्त परिवार में हुआ. परिवार में उनकी वृद्ध माँ, एक दिव्यांग छोटा भाई और दो साल का मासूम बच्चा है. दीपक पहले भी पंजाब और हिमाचल प्रदेश जा चुके थे. छत्तीसगढ़ में जहाँ अनिश्चित काम के बीच दैनिक मजदूरी लगभग 600 रुपये मिलती थी, वहीं कश्मीर में वे अपनी पत्नी के साथ प्रतिदिन करीब 1,000 रुपये कमा लेते थे. वे अपना एक घर बनाना चाहते थे और अपनी शादी के लिए लिया गया 50,000 रुपये का कर्ज चुका रहे थे.
भूपिंदर भैना (सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला, छत्तीसगढ़): तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े भूपिंदर पहली बार काम के सिलसिले में कश्मीर गए थे. इससे पहले उन्होंने हिमाचल प्रदेश के बद्दी में निर्माण मजदूर के रूप में काम किया था. वे अपनी पत्नी के साथ कुलगाम गए थे, जबकि उनका छोटा बेटा छत्तीसगढ़ में उनकी नाबालिग बहन के पास था. हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें श्रीनगर के स्किम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ शनिवार सुबह उन्होंने दम तोड़ दिया. उनके माता-पिता और भाई बद्दी में मजदूरी करते हैं और आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण वे कश्मीर जाने में भी असमर्थ थे.
दूरदराज अंतिम संस्कार और अपनों का दर्द
कानूनी औपचारिकताओं के बाद दोनों मजदूरों का अंतिम संस्कार कुलगाम में ही कर दिया गया. परिवारों के लिए सबसे बड़ा दुख यह रहा कि वे अपने बेटों का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए अपने घर नहीं ला सके और न ही उन्हें अंतिम अलविदा कह सके. छत्तीसगढ़ के बाहर मजदूरों को प्रतिदिन 150 से 250 रुपये अधिक मिलते हैं, यही कारण है कि जोखिम के बावजूद वे प्रवास करने को मजबूर होते हैं.

