सुप्रीम कोर्ट के जज ने कॉलेजियम की अपारदर्शिता पर उठाए सवाल, बोले- न्यायपालिका में ‘लोगों को चींटियाँ’ बताने वाले आ जाते हैं  

न्यायिक नियुक्तियों के कारण न बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की आलोचना करते हुए, सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुयान ने शनिवार को कहा कि पारदर्शिता की कमी ऐसे व्यक्तियों के न्यायपालिका में प्रवेश करने का अवसर बनाती है जो बाद में असंवैधानिक या आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करते हैं. जैसे- “लोगों को चींटियाँ” बताना.

‘एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस’ के मुताबिक, एक रिपोर्ट के विमोचन पर बोलते हुए, जस्टिस भुयान ने जजों की सिफारिश के लिए कारण दर्ज करने की कॉलेजियम की पिछली प्रथा से हाल ही में पीछे हटने पर सवाल उठाया.

जस्टिस भुयान ने कहा: "मैंने देखा है कि कॉलेजियम के पिछले तीन प्रस्तावों में कोई कारण नहीं बताया गया है. क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने वाला कदम है?"

उन्होंने कहा कि कारणों का अभाव न केवल जनता के विश्वास को कमजोर करता है बल्कि योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय भी करता है. उन्होंने कहा, "कारण न बताकर, यह संस्था वास्तव में कई ऐसे जजों के साथ अन्याय करती है जो वास्तव में उत्कृष्ट हैं और जिन्होंने बहुत बढ़िया काम किया है."

जस्टिस भुयान ने कहा कि कारणों को छिपाने से अयोग्य उम्मीदवारों के पदोन्नत होने का रास्ता भी बनता है. उन्होंने कहा: "इसके विपरीत, कारण छिपाकर, हम न्यायपालिका में ऐसे व्यक्तियों के प्रवेश के लिए जगह बनाते हैं जो बाद में लोगों के समूहों को ‘चींटियाँ’ कह सकते हैं और अन्य ऐसी टिप्पणियाँ कर सकते हैं जो पूरी तरह से असंवैधानिक और संविधान के मूल्यों के विपरीत हैं."

उन्होंने आगे कहा: "ऐसे लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए, कुछ चर्चा होनी चाहिए, कुछ कारण दिए जाने चाहिए." हालाँकि जस्टिस भुयान ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणियों का हवाला दिया, जिन्होंने 2024 में न्यायाधीश के रूप में कार्य करते समय दिए गए एक भाषण के दौरान कथित तौर पर एक अल्पसंख्यक समुदाय को 'चींटियाँ' कहकर विवाद खड़ा कर दिया था.

कॉलेजियम के दोबारा अपारदर्शिता की ओर लौटने को हालिया घटनाक्रम बताते हुए, जस्टिस भुयान ने कहा कि पहले के कॉलेजियम प्रस्तावों में सिफारिशों के समर्थन में कम से कम संक्षिप्त कारण शामिल होते थे.

उन्होंने अपने मुख्य भाषण में कहा: "मैंने देखा है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पिछले तीन बयानों में पदोन्नति की सिफारिश के लिए कोई कारण नहीं है, जबकि पहले के बयानों में प्रत्येक सिफारिश का समर्थन किसी न किसी कारण से किया जाता था."

जस्टिस भुयान ने अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण (लाइवस्ट्रीमिंग) के संदर्भ में भी न्यायिक पारदर्शिता पर बात की और इसे "पिछले दशक का सबसे दृश्यमान पारदर्शिता विकास" बताया. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 24 जुलाई को पारित एक आदेश का जिक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि इस फैसले ने पारदर्शिता और अदालत की कार्यवाही के दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन बनाया.

जस्टिस भुयान ने कहा: "अदालत की चिंता यह है कि मौखिक बहसों के संदर्भहीन अंशों और बहस के दौरान जजों द्वारा की गई टिप्पणियों—जो कि कोई निष्कर्ष नहीं हैं—को सनसनीखेज शीर्षकों के साथ प्रसारित किया जा रहा है. इससे जजों, वकीलों और याचिकाकर्ताओं की छवि को नुकसान पहुँच रहा है और अदालत में वास्तव में क्या हुआ था, इसको लेकर जनता की समझ बिगड़ रही है."

उन्होंने आगे कहा: "यह आदेश लाइव स्ट्रीमिंग से पीछे नहीं हटता है; यह प्रक्रिया की पारदर्शिता और उस प्रक्रिया से भ्रामक आख्यान (नैरेटिव) बनाने की छूट के बीच अंतर पैदा करता है."

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