एसआईआर की मसौदा मतदाता सूची में सबसे अधिक नाम उन राज्यों में हटे, जहां पिछले तीन वर्षों में चुनाव हुए
‘द वायर’ में प्रकाशित श्रावस्ती दासगुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, दिल्ली और आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. इन सभी राज्यों में पिछले तीन वर्षों के दौरान विधानसभा चुनाव हुए हैं. बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से यह सवाल उठ रहा है कि यदि इतने मतदाता अपात्र थे, तो उन्हें हाल के चुनावों में मतदान करने की अनुमति कैसे मिली.
17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 6.15 करोड़ नाम हटे
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के तीसरे चरण में जारी मसौदा मतदाता सूचियों से 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 6,15,07,245 नाम हटाए गए हैं. अंतिम मतदाता सूची जारी होने तक यह आंकड़ा बदल सकता है, क्योंकि दावे और आपत्तियों के बाद कई नाम दोबारा जोड़े जा सकते हैं.
कुल हटाए गए नामों की संख्या के लिहाज से महाराष्ट्र सबसे ऊपर है. यहां करीब 2.06 करोड़ नाम हटाए गए हैं. इसके बाद कर्नाटक में 1.07 करोड़, तेलंगाना में 73.39 लाख, दिल्ली में 47.56 लाख और आंध्र प्रदेश में 44.89 लाख नाम हटाए गए हैं.
इनमें से महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, दिल्ली और आंध्र प्रदेश में 2023 से 2025 के बीच विधानसभा चुनाव हुए थे. इस वजह से इन राज्यों में मतदाता सूची की विश्वसनीयता और एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल और गंभीर हो गए हैं.
मतदान करने वालों की संख्या से तुलना ने बढ़ाई चिंता
महाराष्ट्र में 2024 के विधानसभा चुनाव में 6.41 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया था. अब मसौदा सूची से हटाए गए 2.06 करोड़ नाम उस संख्या के लगभग एक-तिहाई के बराबर हैं.
कर्नाटक में 2023 के विधानसभा चुनाव में 3.88 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया था. राज्य में 1.07 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जो पिछले चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्या का करीब आधा है.
तेलंगाना में 2023 के विधानसभा चुनाव में 2.32 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया था. यहां 73.39 लाख नाम हटाए गए हैं, जो मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्या के एक-तिहाई से थोड़ा कम है.
दिल्ली में 2025 के विधानसभा चुनाव के केवल डेढ़ साल के भीतर 47.56 लाख नाम हटाए गए हैं. यह राज्य की पिछली मतदाता सूची में शामिल कुल 1.45 करोड़ मतदाताओं का 32.78 प्रतिशत है. आंध्र प्रदेश में भी 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद 44.89 लाख नाम हटाए गए हैं.
हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हटाए गए सभी मतदाताओं ने पिछले चुनावों में मतदान किया हो. फिर भी आंकड़ों का इतना बड़ा अंतर यह सवाल खड़ा करता है कि हाल के चुनावों के समय मतदाता सूचियों में इतनी बड़ी संख्या में अपात्र मतदाता कैसे मौजूद थे.
प्रतिशत के लिहाज से दिल्ली सबसे आगे
कुल संख्या के अलावा नाम हटाए जाने के प्रतिशत के मामले में भी चुनाव वाले राज्य सबसे ऊपर हैं. दिल्ली में 32.78 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं. इसके बाद केंद्रशासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में 29.65 प्रतिशत, तेलंगाना में 21.69 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 21.14 प्रतिशत, कर्नाटक में 19.48 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 19.09 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं.
दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में विधानसभा चुनाव नहीं होते. यह केंद्रशासित प्रदेश 2020 में एक लोकसभा सीट में विलय किया गया था और यहां 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान हुआ था.
इसके विपरीत, जिन राज्यों में नाम हटाए जाने का प्रतिशत सबसे कम है, उनमें मिजोरम में 5.27 प्रतिशत, ओडिशा में 6.03 प्रतिशत, मणिपुर में 7.50 प्रतिशत, मेघालय में 7.68 प्रतिशत और सिक्किम में 8 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं. इन राज्यों में भी हाल के वर्षों में चुनाव हुए हैं, लेकिन यहां हटाए गए नामों का अनुपात अपेक्षाकृत कम है.
दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक में पहले से उठते रहे हैं सवाल
मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक पहले से ही राजनीतिक विवादों के केंद्र में रहे हैं.
दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी, दोनों ने मतदाता सूचियों को लेकर आरोप लगाए थे. आम आदमी पार्टी ने नई मतदाता प्रविष्टियों और कुछ केंद्रीय मंत्रियों के आवासों पर कई मतदाताओं के नाम दर्ज होने का मुद्दा उठाया था. पार्टी का आरोप था कि चुनाव आयोग को शिकायत देने के बावजूद कार्रवाई नहीं की गई.
दूसरी ओर, भाजपा ने आम आदमी पार्टी पर मतदाता सूचियों में हेरफेर करने का आरोप लगाया था. भाजपा का दावा था कि दिल्ली में 40 से 80 वर्ष की आयु के नए मतदाता जोड़े जा रहे हैं.
कर्नाटक में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पिछले वर्ष महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में एक लाख से अधिक वोटों की कथित चोरी का आरोप लगाया था. निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए राहुल गांधी से शपथपत्र के साथ अपने दावे प्रस्तुत करने को कहा था.
अब एसआईआर के दावे और आपत्तियों के चरण के दौरान कर्नाटक के चुनाव अधिकारियों ने कांग्रेस सांसद मंसूर अली खान की शिकायत निर्वाचन आयोग को भेजी है. शिकायत में एक लाख से अधिक फर्जी मतदाताओं के नाम होने का आरोप लगाया गया है.
महाराष्ट्र में मतदाता संख्या को लेकर विवाद
महाराष्ट्र में भी मतदाता संख्या में अचानक बढ़ोतरी को लेकर विपक्ष सवाल उठाता रहा है. राहुल गांधी और महाविकास अघाड़ी के अन्य नेताओं ने आरोप लगाया था कि 2019 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के बीच राज्य में 32 लाख मतदाता जुड़े. इसके बाद लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के बीच केवल पांच महीनों में 39 लाख नए मतदाता जोड़े गए.
मसौदा सूची जारी होने के बाद राहुल गांधी ने फिर सवाल उठाया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में 9.29 करोड़, विधानसभा चुनाव में 9.7 करोड़ और एसआईआर के बाद 7.78 करोड़ मतदाता कैसे हो सकते हैं. उन्होंने पूछा कि इनमें से कौन-सी सूची सही थी.
विवाद प्रक्रिया पर अधिक, मतदाताओं पर कम
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने कहा कि मतदाता सूचियां एक दिन में खराब नहीं होतीं. उनके अनुसार, एसआईआर ने सवालों के जवाब देने के बजाय नए सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर भी चिंता जताई.
अहमदाबाद विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर नीलांजन सरकार ने कहा कि मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, दोहराव वाले या मृत मतदाताओं की श्रेणी में रखा जा सकता है. लेकिन यदि ऐसे लोग दावा कर रहे हैं कि वे मौजूद हैं और मतदान के योग्य हैं, तो समस्या व्यक्ति की नहीं बल्कि प्रक्रिया की है.
उन्होंने यह भी कहा कि बड़े पैमाने पर पलायन से कुछ नाम हट सकते हैं, लेकिन इससे कमजोर और वंचित समुदायों के नाम गलत तरीके से हटाए जाने का खतरा भी बढ़ता है. इसलिए एसआईआर की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों की दृष्टि से भी गंभीर विषय बन गई है.

