अडानी के स्वामित्व में भारत के सबसे पुराने सीमेंट संयंत्रों में से एक बंद, हजारों लोगों की आजीविका पर संकट
‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित मयंक आनंद की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित झिंकपानी का चाईबासा सीमेंट वर्क्स बंद हो गया है. अडानी समूह के स्वामित्व वाली एसीसी सीमेंट इकाई के बंद होने से हजारों लोगों की आजीविका संकट में पड़ गई है. यह संयंत्र क्षेत्र के सबसे पुराने औद्योगिक प्रतिष्ठानों में से एक था और दशकों से स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार तथा छोटे कारोबार का प्रमुख आधार बना हुआ था.
16 अगस्त को बंद हुआ संयंत्र
चाईबासा सीमेंट वर्क्स को 16 अगस्त 2026 को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया. कंपनी ने इसके पीछे मुख्य कारण चूना पत्थर के भंडार का समाप्त होना बताया है. संयंत्र के लिए जरूरी चूना पत्थर की आपूर्ति अब पहले की तरह स्थानीय खदानों से नहीं हो पा रही थी. इसके अलावा क्लिंकर को दूसरे स्थानों से ट्रकों के जरिए लाने की बढ़ती लागत और संयंत्र की पुरानी मशीनरी ने भी उत्पादन को आर्थिक रूप से मुश्किल बना दिया था.
हालांकि, स्थानीय लोगों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि केवल खनिज भंडार की कमी को बंदी का कारण बताना पर्याप्त नहीं है. उनका आरोप है कि कंपनी ने संयंत्र को आधुनिक बनाने या वैकल्पिक कच्चे माल की व्यवस्था करने के बजाय इसे बंद करने का रास्ता चुना.
हजारों परिवारों की आय पर असर
संयंत्र के बंद होने से सीधे तौर पर स्थायी और ठेका श्रमिक प्रभावित हुए हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार यहां करीब 74 स्थायी कर्मचारी और लगभग 1,500 ठेका श्रमिक काम करते थे. इनके अलावा परिवहन, खानपान, मरम्मत, स्थानीय दुकानों, किराये के मकानों और अन्य छोटे कारोबारों से जुड़े हजारों लोग भी इस संयंत्र पर निर्भर थे.
स्थानीय अनुमानों के अनुसार संयंत्र बंद होने से करीब 50,000 लोगों की आजीविका पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है. कई परिवारों की आय पूरी तरह संयंत्र, खदानों और उससे जुड़े कारोबार पर निर्भर थी. संयंत्र के बंद होने के बाद मजदूरों के सामने रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने का संकट खड़ा हो गया है.
स्थानीय बाजारों में भी इसका असर दिखाई देने लगा है. संयंत्र के कर्मचारियों और श्रमिकों की नियमित आमदनी बंद होने से दुकानदारों, वाहन मालिकों, भोजनालय संचालकों और छोटे व्यापारियों की बिक्री घट गई है.
औद्योगिक क्षेत्र में समय से पहले गिरावट
चाईबासा सीमेंट वर्क्स का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है. यह संयंत्र उस दौर में स्थापित हुआ था जब झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की शुरुआत हो रही थी. लंबे समय तक इसने स्थानीय लोगों को रोजगार दिया और क्षेत्र में सड़क, परिवहन, बाजार तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास में भूमिका निभाई.
संयंत्र का बंद होना केवल एक औद्योगिक इकाई का बंद होना नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों के कमजोर पड़ने का संकेत भी है. विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि खनिज आधारित उद्योगों के बंद होने से पहले सरकार और कंपनियों को वैकल्पिक रोजगार तथा पुनर्वास की योजना तैयार करनी चाहिए. इसके अभाव में औद्योगिक बंदी का पूरा बोझ स्थानीय समुदाय पर पड़ता है.
महिलाओं की आजीविका भी प्रभावित
संयंत्र से जुड़े रोजगार का असर केवल पुरुष श्रमिकों तक सीमित नहीं था. कई महिलाओं की आय भी संयंत्र और उससे जुड़े स्थानीय कारोबार पर निर्भर थी. कुछ महिलाएं छोटे भोजनालय, किराना दुकान, सिलाई, घरेलू उत्पादों की बिक्री और अन्य सेवाओं के जरिए परिवार की आय में योगदान देती थीं.
संयंत्र बंद होने के बाद इन महिलाओं के सामने ग्राहकों की कमी और आय में गिरावट की समस्या पैदा हो गई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि रोजगार के नुकसान का असर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे अधिक पड़ता है, क्योंकि परिवारों में शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों में कटौती शुरू हो जाती है.
मूल भूमि मालिकों की चिंताएं
संयंत्र और खदानों के लिए जिन लोगों की जमीन अधिग्रहित की गई थी, वे भी अब अपनी स्थिति को लेकर चिंतित हैं. कई मूल भूमि मालिकों का कहना है कि जमीन देने के बदले उन्हें रोजगार, मुआवजा और क्षेत्र के विकास का भरोसा दिया गया था. अब जब संयंत्र बंद हो गया है, तो उन वादों की स्थिति स्पष्ट नहीं है.
स्थानीय ग्रामीण यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि उद्योग बंद हो गया है तो अधिग्रहित जमीन का भविष्य क्या होगा. क्या जमीन मालिकों को अतिरिक्त मुआवजा दिया जाएगा, क्या उन्हें वैकल्पिक रोजगार मिलेगा और क्या कंपनी क्षेत्र के विकास के लिए कोई जिम्मेदारी निभाएगी. इन सवालों पर अभी स्पष्ट जवाब नहीं मिला है.
अडानी समूह के अधिग्रहण के बाद बदली स्थिति
अडानी समूह ने 2022 में एसीसी और अंबुजा सीमेंट्स का अधिग्रहण किया था. इसके बाद चाईबासा संयंत्र भी समूह के स्वामित्व में आ गया. उत्पादन अप्रैल और मई 2026 के आसपास बंद हो गया था, जबकि औपचारिक बंदी की घोषणा बाद में की गई.
कंपनी का तर्क है कि संयंत्र को चलाना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रह गया था. लेकिन श्रमिकों और स्थानीय समुदाय का कहना है कि बड़े औद्योगिक समूहों को केवल लाभ और लागत के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए. उन्हें उन समुदायों के प्रति भी जवाबदेह होना चाहिए, जिनकी जमीन, श्रम और संसाधनों के आधार पर उद्योग खड़े किए गए.
विरोध और आगे की मांगें
संयंत्र बंद होने के बाद श्रमिकों और स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं. उनकी मांग है कि कंपनी बंदी से प्रभावित श्रमिकों को उचित मुआवजा दे, स्थायी और ठेका कर्मचारियों के बकाये का भुगतान करे तथा वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करे. इसके अलावा मूल भूमि मालिकों के पुनर्वास और जमीन से जुड़े अधिकारों पर भी स्पष्ट नीति बनाने की मांग की जा रही है.
स्थानीय संगठनों ने सरकार से हस्तक्षेप करने और कंपनी के साथ बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की है. उनका कहना है कि यदि संयंत्र को दोबारा शुरू करना संभव नहीं है, तो क्षेत्र में कोई नया उद्योग स्थापित किया जाना चाहिए, ताकि रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बचाया जा सके.
चाईबासा सीमेंट वर्क्स का बंद होना यह सवाल भी उठाता है कि भारत में पुराने उद्योगों के भविष्य को लेकर सरकार और कंपनियों की जिम्मेदारी क्या है. यदि किसी उद्योग को बंद करना जरूरी हो, तो उससे पहले श्रमिकों, भूमि मालिकों और स्थानीय समुदाय के लिए सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा की ठोस व्यवस्था होनी चाहिए. वरना औद्योगिक विकास के नाम पर दशकों तक संसाधन देने वाले समुदाय ही सबसे बड़ी कीमत चुकाते रहेंगे.

