दिल्ली में युवा प्रदर्शनकारियों का गुस्सा प्रधानमंत्री मोदी की ओर क्यों मुड़ा?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन अब केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गया है. सोनम वांगचुक को भूख हड़ताल के 21वें दिन पुलिस द्वारा जबरन हटाए जाने के बाद बड़ी संख्या में युवाओं ने इस आंदोलन का रुख किया है और उनका गुस्सा सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की ओर दिखाई दे रहा है.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, 23 वर्षीय श्री, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली में डिजाइन विषय में परास्नातक की छात्रा हैं, सोमवार को जंतर-मंतर पर एक सफेद चादर के पीछे खड़ी थीं. इस चादर पर उन्होंने 1990 के दशक के लोकप्रिय बॉलीवुड गीत "चोली के पीछे क्या है?" की पंक्ति लिखी थी. यह चादर प्रतीकात्मक रूप से उसी सफेद कपड़े की याद दिला रही थी, जिसका इस्तेमाल दिल्ली पुलिस ने शनिवार को सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाते समय कैमरों और मोबाइल फोन से दृश्य छिपाने के लिए किया था.
श्री का कहना है कि जब उन्होंने सोशल मीडिया पर सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा हटाए जाने का वीडियो देखा, तो वे स्तब्ध रह गईं. यही घटना उनके लिए आंदोलन में शामिल होने की वजह बनी.
सोनम वांगचुक और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्यों ने 28 जून को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की थी. प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन और प्रबंधन में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं, जिसके लिए शिक्षा मंत्रालय जिम्मेदार है.
हालांकि, शनिवार को सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल ले जाने के बाद आंदोलन का स्वरूप तेजी से बदल गया. जंतर-मंतर पर सैकड़ों की संख्या में युवा पहुंचने लगे और सोमवार तक यह संख्या हजारों में बदल गई. इसी दौरान आंदोलन के नारों और पोस्टरों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला.
सोमवार को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने "जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है" और "मोदी तेरी तानाशाही नहीं चलेगी" जैसे नारे लगाए. कई पोस्टरों में प्रधानमंत्री मोदी पर युवाओं का भविष्य बर्बाद करने, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और विरोध प्रदर्शनों को दबाने के आरोप लगाए गए.
दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्षों में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन और किसान आंदोलन के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना हुई थी, लेकिन उन आंदोलनों को मुख्य रूप से मुस्लिम और सिख समुदायों से जोड़कर देखा गया था. इसके विपरीत, जंतर-मंतर पर चल रहे इस आंदोलन में विभिन्न वर्गों और पृष्ठभूमि से आने वाले बड़ी संख्या में हिंदू युवा शामिल हैं, जो सीधे प्रधानमंत्री मोदी को अपनी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा है कि सरकार की विफलताओं का राजनीतिक नुकसान अक्सर स्थानीय प्रशासन, संबंधित मंत्रालयों या नौकरशाही पर स्थानांतरित हो जाता है. लेकिन इस आंदोलन में पहली बार बड़ी संख्या में युवा प्रदर्शनकारी अपनी नाराजगी सीधे प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ व्यक्त कर रहे हैं.
26 वर्षीय फौजिया, जो अपनी तीन भांजियों के साथ प्रदर्शन में शामिल हुई थीं, कहती हैं कि वे लोकतंत्र की रक्षा और विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकार के रवैये के खिलाफ अपनी आवाज उठाने आई हैं. उनके अनुसार, नागरिकों के साथ औपनिवेशिक शासन की तरह व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता. उन्होंने वर्ष 2020 में नागरिकता संशोधन कानून विरोधी प्रदर्शनों को हटाने की कार्रवाई और वर्तमान घटनाक्रम के बीच समानताएं भी बताईं.
प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई कॉलेज छात्रों ने स्वीकार किया कि वे पहले इस आंदोलन से दूरी बनाए हुए थे. कुछ छात्र नौकरी और प्लेसमेंट की तैयारियों में व्यस्त थे, लेकिन सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा हटाए जाने की घटना ने उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया.
एक छात्रा ने कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सरकार सोनम वांगचुक को इस तरह प्रदर्शन स्थल से हटाएगी. उनके लिए यही वह क्षण था, जिसने उन्हें आंदोलन में शामिल होने का फैसला लेने पर मजबूर किया.
जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए युवाओं की नाराजगी केवल एक व्यक्ति या एक मांग तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है. लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल अब इस आंदोलन के केंद्र में आ चुके हैं. यही वजह है कि यह विरोध प्रदर्शन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग से आगे बढ़कर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने लगा है.

