अपूर्वानंद | आज जो लोग जुलूस में आए, उन्होंने भारतीय जनतंत्र का पहला सबक सीखा और भारतीय राज्य का असली चेहरा भी देखा.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक के समर्थन में हुए आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, सीजेपी की रणनीति और बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर विवाद पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत का केंद्र सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह सवाल था कि क्या सरकार, आंदोलन और पुलिस तीनों ही लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं.
प्रोफेसर अपूर्वानंद ने बताया कि जब वे शाम को जंतर मंतर पहुंचे तब प्रदर्शन लगभग समाप्त हो चुका था, लेकिन दिल्ली की सड़कों पर अब भी देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवाओं, छात्रों, महिलाओं और बुजुर्गों के जत्थे मौजूद थे. उनके अनुसार पुलिस ने बेहद छोटे समूहों पर भी बिना किसी स्पष्ट आवश्यकता के आंसू गैस का इस्तेमाल किया और लोगों को बलपूर्वक तितर-बितर किया. उन्होंने ऐसे कई लोगों से मुलाकात की जिन्हें पुलिस ने पीटा था. मध्य प्रदेश से आए एक प्रदर्शनकारी ने सवाल किया कि अगर दिल्ली देश की राजधानी है तो उसे यहां आने से कौन रोक सकता है. वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा पुलिस हिंसा से आहत होकर रो पड़ी और उसने कहा कि अगर पुलिस का यही चेहरा है तो फिर प्रशासनिक सेवा में जाने का उद्देश्य क्या रह जाता है.
अपूर्वानंद का कहना था कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जिनका किसी छात्र या राजनीतिक संगठन से कोई संबंध नहीं था. वे पहली बार किसी आंदोलन में शामिल हुए थे और पहली बार उन्होंने राज्य की ताकत और पुलिस की कार्यशैली को इतने करीब से देखा. उनके अनुसार यह अनुभव इन लोगों के साथ उनके गांवों और शहरों तक जाएगा और सरकार के लिए यह राजनीतिक रूप से शुभ संकेत नहीं है.
चर्चा के दौरान सोनम वांगचुक के आंदोलन की दिशा पर भी सवाल उठे. अपूर्वानंद ने कहा कि शुरुआत में आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग थी. लेकिन बाद में जब वांगचुक की पत्नी की ओर से संसद में शिक्षा पर चर्चा जैसे व्यापक और अमूर्त विकल्प सामने आए तो आंदोलन का मूल प्रश्न धुंधला पड़ गया. उनका मानना था कि इससे सरकार पर सीधी जवाबदेही तय करने का दबाव कमजोर हुआ.
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने वांगचुक को अस्पताल ले जाकर यह मान लिया था कि आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ. लोगों में सरकार की कथित असंवेदनशीलता और पुलिस कार्रवाई को लेकर गुस्सा बढ़ा और बड़ी संख्या में लोग जंतर मंतर पहुंच गए. उनके अनुसार यह भीड़ किसी संगठन के आह्वान से अधिक लोगों के भीतर जमा असंतोष की अभिव्यक्ति थी.
बातचीत का एक अहम हिस्सा सीजेपी की भूमिका पर केंद्रित रहा. प्रोफेसर अपूर्वानंद ने सवाल उठाया कि आखिर जेपी नड्डा को ज्ञापन सौंपने का फैसला किस प्रक्रिया से लिया गया. क्या यह निर्णय आंदोलन में शामिल सभी संगठनों और छात्रों की सहमति से हुआ था या कुछ लोगों ने मिलकर यह फैसला कर लिया. उनका कहना था कि जो लोग सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हैं, उन्हें भी अपने फैसलों में वही मानक अपनाने चाहिए.
बिहार के भरत तिवारी एनकाउंटर पर उन्होंने कहा कि किसी भी अपराध का समाधान एनकाउंटर नहीं हो सकता और कानून का शासन तभी मजबूत होगा जब हर मामले की निष्पक्ष जांच हो. बिहार सरकार द्वारा पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच समिति गठित किए जाने का उल्लेख करते हुए यह उम्मीद जताई गई कि सच्चाई सामने आएगी और यदि पुलिस से गलती हुई है तो उसे स्वीकार करते हुए जवाबदेही तय की जाएगी. चर्चा का निष्कर्ष यही रहा कि लोकतंत्र केवल सरकार से नहीं, बल्कि आंदोलनों, राजनीतिक दलों और राज्य की संस्थाओं से भी समान रूप से पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही की अपेक्षा करता है.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

