नसीरुद्दीन शाह | इस प्रधानमंत्री का पाखंड लगभग हास्यास्पद है, मैं मोदी को गंभीरता से नहीं लेता
‘द वायर’ के लिए वरिष्ठ पत्रकार, संपादक करन थापर ने संसद मार्च के लिए निकले छात्रों पर दिल्ली पुलिस की बर्बरता के बारे में भारतीय फिल्म जगत के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से बातचीत की. यहां पेश है बातचीत का सारांश :
करन थापर: प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे (नीट परीक्षा लीक और छात्रों के आंदोलन) को जिस तरह संभाला है, आप उसे कैसे देखते हैं? उनके 12 साल के प्रधानमंत्रित्व काल में उभरे सबसे गंभीर मुद्दों में से यह एक होना चाहिए.
नसीरुद्दीन शाह: मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं है. उन्होंने कब किसी बात पर ईमानदारी से बात की है? क्या उन्होंने अपनी किसी भी गलती की ज़िम्मेदारी ली है? क्या उन्होंने कभी इस बात को स्वीकार किया है कि वह शायद गलत थे? नहीं. वह 'दिव्य' हैं और उनकी इस कथित दिव्यता ने उनके सभी समर्थकों को प्रभावित किया है. उन्होंने जो जादू किया है, उसे देखना अद्भुत है. वह वैज्ञानिकों के एक समूह से गटर गैस के बारे में बात करते हैं, जो तालियाँ बजाते हैं. वह भगवान गणेश का सिर प्लास्टिक सर्जरी का परिणाम होने की बात करते हैं. कर्ण और कौरवों का जन्म आईवीएफ से होना बताते हैं. और डॉक्टर उनका ताली बजाकर स्वागत करते हैं. हमारे साथ क्या हो रहा है? क्या कोई कभी इस आदमी से सवाल नहीं पूछने वाला है? झूठ पर झूठ पर झूठ पर झूठ. वह प्रेस से कभी बात नहीं करते क्योंकि वह डरे हुए हैं. उनसे 2002 (गुजरात दंगों) के बारे में पूछा जाएगा. उनसे उनके कथित 35 साल के भीख माँगने, हिमालय में उनके ध्यान लगाने, पेरिस और न्यूयॉर्क तथा अमेरिका के 20 अन्य राज्यों का दौरा करने के बारे में पूछा जाएगा, इससे पहले कि वह कुछ थे. और फिर भी वह एक बहुत ही गरीब परिवार से आते हैं. हिंदी फिल्मों ने यह किया है. आप जानते हैं कि उनके नकली आँसू वास्तव में लोगों को भावुक कर देते हैं. वह जब रोते हैं तो वह भयानक अदाकारी करते हैं और वह भी केवल अपने लिए. वह कभी उन जवानों के लिए नहीं रोए जो पुलवामा में शहीद हुए या वे पर्यटक जो पहलगाम में मारे गए. मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं है कि उन्होंने इस मुद्दे को संबोधित नहीं किया है. उन्होंने किस मुद्दे को संबोधित किया है?
वह हमसे पेट्रोल बचाने के लिए कहते हैं और खुद दस एसयूवी के काफिले में घूमते हैं. वह हमसे विदेश यात्रा न करने के लिए कहते हैं और अगली रात छह देशों के दौरे पर निकल जाते हैं जहाँ वह कोई फर्जी पदक प्राप्त करते हैं. सोना मत खरीदो. पैसे बचाओ. यह उनके लिए नहीं है. वह दिव्य (डिवाइन) हैं.
करन थापर: आपकी नज़र में, वह एक ढोंगी (फ्रॉड) हैं.
नसीरुद्दीन शाह: वह ढोंगी होने के बहुत करीब हैं, लेकिन मुझे उनकी किसी भी बात को गंभीरता से लेना मुश्किल लगता है.
करन थापर: जब छात्रों ने परीक्षा लीक और शिक्षा प्रणाली के बारे में अपने सांसदों और अपनी सरकार से बात करने के लिए संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, तो सोमवार को उन पर आँसू गैस के गोले छोड़े गए और लाठीचार्ज किया गया. 'हिंदुस्तान टाइम्स' का कहना है कि सैकड़ों लोग घायल हुए. ये अपनी किशोरावस्था या 20-22 वर्ष की आयु के लोग थे. अपनी इस प्रतिक्रिया से, क्या सरकार ने भारत के संजोए हुए लोकतंत्र को शर्मसार और धोखा दिया है?
नसीरुद्दीन शाह: घायलों में, कथित तौर पर छात्रों की तुलना में अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे और ऐसी बात सुनना काफी आश्चर्यजनक है. यह लगभग 600 पुलिसकर्मी और लगभग 60 छात्र या ऐसा ही कुछ है. जो हुआ है वह बिल्कुल अकल्पनीय है. मेरे लिए इस बात को समझ पाना असंभव है कि जो लोग अपने अधिकारों की मांग कर रहे इन छात्रों को क्रूरता से पीट रहे हैं, वे खुद ज़्यादातर युवा लोग ही हैं. उनमें से बहुत से लोग पुलिसकर्मी नहीं लगते. और जैसा कि सभी जानते हैं, वे नाम का बैज नहीं पहने हैं, वे रैंक नहीं लगाए हैं, वे उचित वर्दी में भी नहीं हैं. उनमें से कुछ तो यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि वे निजी तौर पर किराए पर लिए गए गुंडे हैं.
तो हमारे भविष्य पर गुंडों की एक पूरी सेना को छोड़ देना... और प्रधानमंत्री में इतना दुस्साहस है कि जब यह सब हो रहा है तब वह युवाओं को संबोधित करते हैं, जबकि उन्होंने उन पर टिप्पणी करने या उनसे यह पूछने तक की ज़हमत नहीं उठाई कि उनका मुद्दा क्या है. और वह कहते हैं कि युवाओं को चुनौतियों का सामना करना चाहिए. युवा इसके अलावा और क्या कर रहे हैं? मेरा मतलब है, इस प्रधानमंत्री का पाखंड लगभग हास्यास्पद है. और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. तो इसने मेरा दिल तोड़ दिया और मेरा खून खौल उठा क्योंकि जैसा कि मैंने उस वीडियो में कहा था, मैंने छात्रों के साथ बहुत समय बिताया है और यह मेरे जीवन का सबसे समृद्ध हिस्सा रहा है. मैंने कथित विशेषज्ञों द्वारा पढ़ाए जाने की तुलना में युवाओं के साथ बातचीत करके अधिक हासिल किया है. और बिना किसी उकसावे के, छोटे बच्चों के सिर फटने, महिलाओं पर हमले और उत्पीड़न, इन पुलिसकर्मियों द्वारा अपने डंडों से अश्लील हरकतें करते देखना... ये पुलिसकर्मी नहीं हो सकते. उन्हें अपनी वर्दी का कुछ तो सम्मान होता.
वे हमारे नागरिकों की रक्षा और सुरक्षा करने की शपथ लेते हैं. और यह दिल्ली पुलिस जो दिन-दहाड़े हत्याओं, बलात्कार, अपहरण को रोक नहीं सकती, वह रैपिड एक्शन फोर्स के साथ मिलकर इन छात्रों को पीटने और कुचलने के लिए इस तरह कार्रवाई में आ जाती है, जो किसी भी तरह से उकसाने वाले नहीं हैं. और जो मैंने आज सुबह देखा वह यह था कि छात्र जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं. यह आश्चर्यजनक नहीं है. मेरा मतलब है, जब एक चूहे को भी दीवार से सटा दिया जाता है तो वह भी पलटकर लड़ता है. और ये बच्चे जो माँग कर रहे हैं उसमें वे बिल्कुल सही हैं. उनका गुस्सा पूरी तरह से वाजिब है. और इस सरकार को उन पर कोई ध्यान न देने के लिए बहरा, गूंगा और अंधा होना पड़ेगा.

