भबानी शंकर नायक | हिंदुत्व की राजनीति का अंतलेख लिखने के लिए खून से लाल हुई दिल्ली की सड़कें
दिल्ली में छात्रों और युवाओं के विरोध-प्रदर्शन पर हुई पुलिस कार्रवाई को आधार बनाकर भबानी शंकर नायक ने केंद्र सरकार और हिंदुत्व की राजनीति की तीखी आलोचना की है. उनका कहना है कि दिल्ली की सड़कों पर बहा छात्रों का खून केवल पुलिस हिंसा की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है जो असहमति की आवाज को बलपूर्वक दबाने का प्रयास करती है.
उनके अनुसार, छात्रों का आंदोलन परीक्षा पत्र लीक और शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती अव्यवस्था के खिलाफ था. छात्रों की मांग केवल इतनी थी कि सरकार परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखे और अपनी जवाबदेही स्वीकार करे. बार-बार होने वाले पेपर लीक ने सरकारी शिक्षा संस्थानों की साख को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा मिलने की आशंका बढ़ गई है. उनका आरोप है कि शिक्षा व्यवस्था को इस दिशा में धकेला जा रहा है, जहां निजी संस्थानों और कॉरपोरेट हितों को लाभ मिल सके.
वे दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को अत्यधिक क्रूर और अमानवीय बताते हैं. उनके मुताबिक, पुलिस का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन विरोध प्रदर्शन के दौरान उसने छात्रों और युवाओं के साथ हिंसक व्यवहार किया. शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों को गंभीर चोटें पहुंचाई गईं और उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया गया. इसे वे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं.
भबानी शंकर नायक यह भी कहते हैं कि भारत में सत्ता में रही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने समय-समय पर आंदोलनों को दबाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल किया है. उन्होंने कांग्रेस सरकारों के दौरान किसानों और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया है, लेकिन उनका मानना है कि वर्तमान सरकार ने इसे अधिक आक्रामक और वैचारिक स्वरूप दिया है.
उनके अनुसार, यह आंदोलन कई मायनों में अलग था. इसे किसी राजनीतिक दल या संगठन ने आयोजित नहीं किया था, बल्कि हजारों छात्रों और युवाओं की स्वतःस्फूर्त भागीदारी से यह खड़ा हुआ. आंदोलन का कोई एक नेता नहीं था, फिर भी प्रदर्शनकारी अपने उद्देश्य और अहिंसक तरीके को लेकर स्पष्ट थे. पुलिस हिंसा के बावजूद उन्होंने संयम बनाए रखा और हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दिया.
विरोध-प्रदर्शन के दौरान नागरिक समाज की भागीदारी को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया है. स्थानीय डॉक्टर घायल छात्रों का इलाज करने पहुंचे, लोगों ने भोजन और पानी की व्यवस्था की और डिजिटल माध्यमों से प्रदर्शनकारियों की मदद की. उनका कहना है कि पहली बार दिल्ली की सड़कों पर हो रहे विरोध-प्रदर्शन को देशभर के लोगों के घरों से प्रत्यक्ष समर्थन मिलता दिखाई दिया. धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर लोगों ने इस आंदोलन का समर्थन किया, जो इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आया.
वे इस आंदोलन को भारतीय राजनीति में विरोध की एक नई संस्कृति के रूप में देखते हैं. उनके अनुसार, यह केवल परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों, संवैधानिक मूल्यों और जवाबदेह शासन की मांग को भी सामने लाता है. उनका दावा है कि युवाओं का यह संघर्ष भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
अंत में, उनका कहना है कि दिल्ली की सड़कों पर बहा छात्रों का खून इतिहास में केवल एक दुखद घटना के रूप में दर्ज नहीं होगा, बल्कि इसे लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और जवाबदेह शासन के लिए हुए संघर्ष के रूप में याद किया जाएगा. उनके मुताबिक, यह आंदोलन भय की राजनीति के खिलाफ खड़े होने और लोकतांत्रिक भारत के भविष्य को सुरक्षित करने का संदेश देता है.
(भबानी शंकर नायक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं. यह कॉउंटरकरेन्ट्स में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

