पश्चिम बंगाल से महाराष्ट्र तक विपक्ष के टूटने की आशंका
पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहा मौजूदा संकट केवल दल-बदल या टूट का पुराना भारतीय राजनीतिक किस्सा नहीं है. मई के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो हलचल दिख रही है, वह एक नए तरह के सत्ता-संयोजन और विपक्ष के विघटन की दिशा में इशारा करती है. यह केवल विधायकों या सांसदों के पाला बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे संगठन और राजनीतिक विरासत के एक साथ खींच लिए जाने की प्रक्रिया बनती जा रही है.
‘नीलाद्रि चटर्जी और अरिल्ड एंगेल्सेन रूड’ के मुताबिक, ताजा घटनाक्रम अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है, लेकिन संकेत गंभीर हैं. तृणमूल के एक बागी नेता रितब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 80 में से 65 विधायक उनके साथ हैं. लोकसभा में पार्टी के 28 में से 20 सांसदों ने कथित तौर पर एक छोटे सहयोगी दल में विलय की इच्छा जताई है. राज्यसभा में भी कुछ इस्तीफों के बाद स्थिति और कमजोर दिख रही है. यह सिर्फ संख्या का संकट नहीं, बल्कि संगठनात्मक नियंत्रण के टूटने का संकेत है.
भारत की राजनीति अब तक व्यक्तिगत दल-बदल की आदी रही है. नेता एक-एक करके पाला बदलते रहे हैं और नई पार्टी उन्हें अपने वोट बैंक और संगठन के साथ समाहित कर लेती है. लेकिन इसमें कानूनी अड़चनें और नैतिक असहजता दोनों रहे हैं. यह प्रक्रिया धीमी होती थी और मतदाताओं के लिए जवाबदेही का सवाल भी खड़ा करती थी.
लेकिन बंगाल में जो नया मॉडल उभरता दिख रहा है, उसे कुछ विश्लेषक “पार्टी एब्ज़ॉर्प्शन” कह रहे हैं. यानी अब लक्ष्य केवल व्यक्ति नहीं है, बल्कि पूरी पार्टी संरचना है. विधायक, सांसद, बूथ स्तर के कार्यकर्ता, स्थानीय नेटवर्क और राजनीतिक विरासत तक को एक साथ खींचकर सत्ता के नए केंद्र में समाहित करने की कोशिश. यह केवल विभाजन नहीं, बल्कि विपक्ष को उपयोगी बनाकर उसकी स्वतंत्रता खत्म करने की रणनीति है.
इस प्रक्रिया की खास बात यह है कि बागी सिर्फ तृणमूल छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि उसकी विरासत पर दावा भी कर रहे हैं. वे अभी भी पार्टी के संगठनात्मक वजन और ममता बनर्जी की प्रतीकात्मक सत्ता को अपने साथ जोड़कर चलने की कोशिश कर रहे हैं. यह एक तरह से पुरानी पार्टी बनाम नई व्याख्या की लड़ाई बन जाती है.
यह भी दिलचस्प है कि इस पूरे विमर्श में ममता बनर्जी का प्रतीकात्मक प्रभाव बरकरार रखा जा रहा है, जबकि निशाने पर संगठनात्मक उत्तराधिकारी हैं. बागियों की दलील है कि शुरुआती तृणमूल आंदोलन संघर्ष, कल्याण और बंगाली अस्मिता पर आधारित था, लेकिन बाद में वह सत्ता-केंद्रित और केंद्रीकृत हो गया. यह नैरेटिव उन्हें नैतिक पुनर्स्थापना का आधार देता है, भले ही वे खुद उसी व्यवस्था का हिस्सा रहे हों.
इस प्रवृत्ति को समझने में राजनीतिक वैज्ञानिक द्वैपायन भट्टाचार्य का “फ्रेंचाइज़ी पॉलिटिक्स” वाला विश्लेषण मदद करता है. उनके अनुसार स्थानीय नेता एक तरह की क्षेत्रीय सत्ता चलाते हैं, जो ऊपर से पार्टी ब्रांड से जुड़ी होती है. जब सत्ता कमजोर पड़ती है, तो वही नेटवर्क अपने अस्तित्व के लिए नए संरक्षक की तलाश करने लगता है.
इसी तरह एंजेलो पनाबीआन्को का पार्टी संगठन पर अध्ययन बताता है कि जब किसी करिश्माई नेता का प्रभाव संस्थागत ढांचे में नहीं बदलता, तो हार के बाद विचारधारात्मक बहस नहीं होती, बल्कि विरासत पर कब्जे की होड़ शुरू हो जाती है.
महाराष्ट्र का अनुभव भी इस प्रवृत्ति का उदाहरण माना जाता है, जहां बड़े गुटों ने खुद को असली पार्टी बताकर सत्ता पक्ष में विलय किया. इससे क्षेत्रीय पार्टियों की संगठनात्मक पकड़ कमजोर हुई और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी.
बंगाल का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां तृणमूल कांग्रेस केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि बंगाली पहचान और केंद्र-विरोधी राजनीति का प्रतीक रही है. अगर इसका बड़ा हिस्सा सत्ताधारी खेमे में समाहित हो जाता है, तो यह केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान का पुनर्गठन होगा.
भारतीय जनता पार्टी की रणनीति भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है. एक ओर वह वैचारिक रूप से हिंदुत्व की राजनीति पर आधारित है, दूसरी ओर वह सत्ता विस्तार के लिए स्थानीय नेताओं को समाहित करने में सक्षम दिखती है. यह एक तरह का संगठनात्मक विस्तार है, जिसमें पार्टी अपने नेटवर्क को समाज और प्रशासन तक फैलाती है.
कानूनी स्तर पर यह स्थिति जटिल है. संविधान की दसवीं अनुसूची दल-बदल रोकने के लिए बनी थी, लेकिन इसमें एक बड़ा प्रावधान यह है कि अगर दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो इसे वैध माना जा सकता है. यही प्रावधान अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक दल-बदल को बढ़ावा देता दिखता है.
इसका परिणाम यह होता है कि अवसरवाद खत्म नहीं होता, बल्कि सामूहिक रूप ले लेता है. और जब यह सामूहिक रूप लेता है, तो विपक्ष का वोट बैंक ही नहीं, बल्कि उसकी संगठनात्मक रीढ़ भी टूट जाती है.
दीर्घकाल में इसका असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा. यह मॉडल अगर मजबूत होता है, तो क्षेत्रीय पार्टियों का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वे चुनाव जीतने के बाद भी हार को संगठनात्मक रूप से झेल पाने में सक्षम हैं या नहीं. क्योंकि अब असली सवाल यह नहीं है कि कोई पार्टी चुनाव जीत सकती है, बल्कि यह है कि क्या वह हारने के बाद भी पार्टी बनी रह सकती है.
अगर संगठन, विचारधारा और आंतरिक लोकतंत्र कमजोर है, तो चुनावी हार केवल अंत नहीं होगी, बल्कि पूरी पार्टी के एब्ज़ॉर्प्शन की प्रक्रिया की शुरुआत बन जाएगी.
नीलाद्रि चटर्जी स्वीडन के लिनियस विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक अध्ययन विभाग में वरिष्ठ व्याख्याता और शोधकर्ता हैं एवं अरिल्ड एंगेल्सेन रूड नॉर्वे के ओस्लो विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर हैं.

