कैसे दिवालियापन कानून अमीरों को फायदा और जनता को सजा देते हैं ?
राजनीतिक टिप्पणीकार भवानी शंकर नायक के इस लेख का केंद्रीय तर्क है कि पूंजीवादी व्यवस्था में दिवालियापन और ऋण चुकाने में असमर्थता से जुड़े कानून आम लोगों और बड़े कारोबारियों के साथ समान व्यवहार नहीं करते. आम व्यक्ति छोटे कर्ज की अदायगी में असफल होता है तो उसे वित्तीय संस्थाओं की कानूनी कार्रवाई, दबाव और सामाजिक बदनामी का सामना करना पड़ता है, जबकि बड़े कारोबारी और कंपनियां दिवालियापन की कानूनी प्रक्रिया के जरिए भारी कर्ज से राहत पाने में सफल हो जाती हैं.
लेख में 2008 के अमेरिकी वित्तीय संकट में लेहमैन ब्रदर्स से लेकर भारत में 2026 में सुभाष चंद्र से जुड़े मामले तक उदाहरण दिए गए हैं. लेख के मुताबिक, सुभाष चंद्र पर करीब 22,006 करोड़ रुपये का कर्ज था, जिसे हाल की व्यक्तिगत दिवालियापन प्रक्रिया में घटाकर केवल 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान तक सीमित कर दिया गया. इसे बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों के लिए मौजूद उस व्यवस्था के उदाहरण के रूप में पेश किया गया है, जिसमें जोखिम का बोझ अंततः आम लोगों, बैंकों और सार्वजनिक बचत पर पड़ता है.
लेख के अनुसार, दिवालियापन ऐसी वित्तीय स्थिति है जिसमें कर्जदार अपनी देनदारियां चुकाने में असमर्थ हो जाता है और इसके बाद कर्ज से राहत या उसके निपटारे के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू होती है. सामान्य तौर पर ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य उन व्यक्तियों और कारोबारों को राहत देना है जो ऐसी परिस्थितियों में कर्ज नहीं चुका पाए जिन पर उनका पूरा नियंत्रण नहीं था.
लेकिन लेखक का तर्क है कि आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था में इस सिद्धांत का इस्तेमाल असमान तरीके से होता है. बड़े कारोबारियों के लिए दिवालियापन कर्ज से निकलने की रणनीति बन जाता है, जबकि छोटे कर्जदारों के लिए यही व्यवस्था तनाव, कानूनी धमकी और सामाजिक कलंक का कारण बनती है.
दुनिया भर में दिवालियापन की बढ़ती घटनाओं को लेकर भी लेख सवाल उठाता है. शुरुआती समझौते और अदालत के बाहर कर्ज निपटाने जैसी प्रक्रियाओं को कारोबार की मजबूती, बाजार के विकास और निवेशकों के विश्वास के लिए उपयोगी बताया जाता है. लेकिन लेखक का कहना है कि इन दावों के समर्थन में पर्याप्त ठोस आंकड़े और प्रमाण नहीं हैं.
दिवालियापन का बदलता इतिहास
इतिहास में अलग-अलग समाजों ने कर्ज न चुका पाने वालों से अलग-अलग तरीके से व्यवहार किया. प्राचीन समाजों में दिवालियापन को सामाजिक और आर्थिक अपराध की तरह देखा जाता था. यूनान में कर्ज की गुलामी से लेकर यूरोप के कई हिस्सों में कैद और मौत की सजा तक का प्रावधान रहा.
रोमन, अंग्रेज और फ्रांसीसी व्यवस्थाओं में भी दिवालियापन को गंभीर अपराध माना गया. समय के साथ यह सोच बदली और कर्जदार को दंड देने के बजाय उसे कर्ज चुकाने के लिए समय और राहत देने की व्यवस्था विकसित हुई. कई धार्मिक परंपराओं में भी कर्जदार को माफ करने की बात कही गई, जिसने बाद में गरीब और कर्जग्रस्त देशों के लिए कर्ज राहत अभियानों को प्रेरणा दी.
इंग्लैंड का 1542 का दिवालियापन कानून इस बदलाव के शुरुआती कानूनी उदाहरणों में माना जाता है. इस कानून में उन लोगों की आलोचना की गई थी जो दूसरों से उधार लेकर संपत्ति हासिल करते थे, फिर भुगतान से बचने के लिए गायब हो जाते थे और उस संपत्ति को निजी सुख-सुविधाओं पर खर्च करते थे. कानून ने अधिकारियों को ऐसे कर्जदारों को गिरफ्तार करने, उनकी संपत्ति जब्त करने और उसे बेचकर कर्जदाताओं को उनके कर्ज के अनुपात में भुगतान करने का अधिकार दिया.
लेकिन पूंजीवाद के विस्तार के साथ व्यक्तिगत कर्ज और कारोबारी कर्ज के बीच अंतर बढ़ता गया. लेखक के मुताबिक, आज व्यक्तिगत कर्जदारों को कानून और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है, जबकि राजनीतिक और कारोबारी संबंधों वाले बड़े कारोबारी कर्ज से राहत पाने के लिए कानूनी रास्तों का इस्तेमाल कर सकते हैं.
पूंजीवाद और दिवालियापन
लेख में एडम स्मिथ, चार्ल्स फूरिए और मिशेल फूको जैसे विचारकों के विचारों का उल्लेख करते हुए दिवालियापन की नैतिकता पर चर्चा की गई है. एडम स्मिथ का मानना था कि खुला और ईमानदार दिवालियापन ऐसा रास्ता है जो कर्जदार के लिए कम अपमानजनक और कर्जदाता के लिए कम नुकसानदेह होता है.
चार्ल्स फूरिए ने दिवालियापन को ऐसी कारोबारी प्रवृत्ति माना जो परजीवी और अनुत्पादक वर्ग को बढ़ावा देती है. उनके अनुसार, जब धोखाधड़ी को व्यवस्था का हिस्सा बना दिया जाता है तो ईमानदार व्यक्ति भी उसी रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित हो सकता है.
कार्ल मार्क्स ने भी ऋण और साख व्यवस्था की आलोचना की थी. उनके अनुसार, साख प्रणाली पूंजीवादी उत्पादन को बढ़ावा देते हुए दूसरों के श्रम का इस्तेमाल करने और सट्टेबाजी तथा धोखाधड़ी को बढ़ाने वाली व्यवस्था में बदल सकती है. लेखक इस विचार को आधुनिक कॉरपोरेट दिवालियापन से जोड़ते हुए तर्क देता है कि कर्ज संकट से निकलने के लिए कानून का इस्तेमाल बड़े पूंजीपति वर्ग के हित में किया जा रहा है.
कानून किसके हित में?
लेख का मुख्य सवाल यही है कि दिवालियापन कानून वास्तव में किसकी रक्षा कर रहे हैं. एक ओर आम लोगों की छोटी-सी कर्ज अदायगी में चूक भी उनके जीवन में बड़ा संकट पैदा कर सकती है. दूसरी ओर बड़े कारोबारी भारी कर्ज के बावजूद कानूनी समझौतों और दिवालियापन प्रक्रियाओं के माध्यम से अपनी देनदारियों को काफी कम कराने में सफल हो सकते हैं.
लेखक इसे जोखिम के सामाजिककरण और लाभ के निजीकरण की प्रक्रिया मानते हैं. यानी कारोबार से होने वाला लाभ निजी हाथों में रहता है, लेकिन कारोबार के असफल होने का नुकसान बैंकों, बीमा कंपनियों, जमाकर्ताओं और अंततः आम जनता पर पड़ता है.
लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ कंपनियां सट्टा आधारित वित्तीय गतिविधियों, आंतरिक कर्ज और सहायक कंपनियों के माध्यम से धन के हस्तांतरण जैसी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करती हैं. जब कारोबार संकट में आता है तो दिवालियापन कानून उसे राहत प्रदान कर सकता है, जबकि उस धन का नुकसान व्यापक समाज को उठाना पड़ता है.
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान लोगों के आर्थिक तंत्र पर भरोसे को होता है. यदि आम लोगों को यह महसूस होने लगे कि कानून छोटे कर्जदारों पर कठोर और बड़े कर्जदारों पर नरम है, तो बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में विश्वास कमजोर हो सकता है.
लेख का निष्कर्ष है कि दुनिया भर में दिवालियापन कानूनों में व्यापक सुधार की जरूरत है. ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जो कारोबार को असफल होने की स्थिति में उचित राहत दे, लेकिन आम लोगों की बचत और सार्वजनिक धन की कीमत पर बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों को अनुचित लाभ न पहुंचाए.
लेखक के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में दिवालियापन पूंजी के लिए केवल संकट से बाहर निकलने का कानूनी रास्ता नहीं रह गया है, बल्कि वह पूंजीवादी संचय और असमानता को बनाए रखने का माध्यम भी बन गया है. इसलिए जरूरत ऐसी दिवालियापन व्यवस्था की है जो कर्जदार और कर्जदाता दोनों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए और सबसे महत्वपूर्ण रूप से आम लोगों की बचत तथा आर्थिक सुरक्षा की रक्षा करे.
(Countercurrents.org में प्रकाशित भवानी शंकर नायक का यह लेख उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.)

