वी-डेम के लोकतंत्र सूचकांक में भारत की स्थिति 1975 के बाद सबसे निचले स्तर पर

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति यानी यूएन सीईआरडी की ओर से भारत में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने पर जताई गई चिंता, यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग स्थित वैरायटीज ऑफ डेमोक्रेसी यानी वी-डेम संस्थान की ताजा रिपोर्ट से मेल खाती है. वी-डेम ने भारत को उन देशों में शामिल किया है जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे निरंकुशता की ओर बढ़ रही है और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो रही हैं.

यूएन सीईआरडी ने 2007 के बाद भारत की पहली समीक्षा में कानून लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा बड़े पैमाने पर कथित उल्लंघनों पर "गंभीर चिंता" जताई. समिति ने विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में लोगों, खासकर मुस्लिम मतदाताओं, के नाम बाहर किए जाने को लेकर भी चिंता व्यक्त की.

वी-डेम के मार्च में जारी चुनावी लोकतंत्र सूचकांक में भारत का प्रदर्शन 2009 के बाद लगातार गिरा है. ताजा सूचकांक में भारत का स्कोर 1975 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जब देश आपातकाल के दौर से गुजर रहा था.

रिपोर्ट के अनुसार, न्यायिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार नियंत्रण, चुनाव प्रबंधन संस्था की स्वायत्तता तथा सरकारी अधिकारियों के निष्पक्ष प्रशासन जैसे मानकों पर भारत की स्थिति पिछले 50 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर है. संस्थागत स्वायत्तता में गिरावट के साथ शैक्षणिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी कमी आई है और पत्रकारों के उत्पीड़न में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

शैक्षणिक स्वतंत्रता से जुड़े संकेतकों में भी गिरावट सामने आई है. इनमें अकादमिक अभिव्यक्ति, शोध और अध्यापन की स्वतंत्रता तथा शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता शामिल हैं.

वी-डेम के आंकड़े भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठाते हैं. वहीं यूएन सीईआरडी की चिंता मतदाता सूची और नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी से जुड़े मुद्दों को सामने लाती है. दोनों रिपोर्टों को साथ देखने पर सवाल उठता है कि भारत में चुनावी प्रक्रिया, संस्थागत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा कितनी मजबूत रह गई है.

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