मदीहा सिद्दीकी | भारत में अकादमिक स्वतंत्रता क्यों लगातार कमजोर हो रही है?

'मकतूब मीडिया' में मदीहा सिद्दीकी ने लिखा है कि भारत में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता लगातार कमजोर हो रही है. 'स्कॉलर्स एट रिस्क' की वार्षिक रिपोर्ट 'फ्री टू थिंक 2026' ने भाजपा सरकार के दौर में भारत की अकादमिक स्वतंत्रता को "गंभीर रूप से प्रतिबंधित" बताया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल की नीतियों ने विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण को बढ़ाया है.

रिपोर्ट में उद्धृत वी-डेम संस्थान के अकादमिक फ्रीडम इंडेक्स के अनुसार, भारत का स्कोर 2022 में 0.38 से घटकर 2025 में 0.14 रह गया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2013-14 के बाद से अकादमिक स्वतंत्रता के लगभग सभी संकेतकों में गिरावट आई है और भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां यह स्वतंत्रता "पूरी तरह प्रतिबंधित" मानी जाती है. विश्वविद्यालयों में सेमिनार रद्द होने, किताबों पर रोक, अल्पसंख्यक संस्थानों पर दबाव, आलोचकों को "देशद्रोही", "दिमागी नक्सल" या "टुकड़े-टुकड़े गैंग" जैसे लेबल दिए जाने और छात्रों-शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई के उदाहरण सामने आए हैं.

विश्वविद्यालयों पर बढ़ता सरकारी नियंत्रण

अकादमिक स्वतंत्रता के प्रमुख मानकों में संस्थागत स्वायत्तता भी शामिल है. रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी उच्च शिक्षा पर राज्य के प्रभाव का प्रमुख माध्यम बनता जा रहा है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने संस्थागत और अकादमिक स्वायत्तता बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन इसके साथ ही उच्च शिक्षा के अधिक केंद्रीकरण की व्यवस्था भी सामने आई. केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा यानी सीयूईटी इसका एक उदाहरण है. इसके तहत अलग-अलग विश्वविद्यालयों की अपनी प्रवेश परीक्षाओं और मूल्यांकन पद्धतियों की जगह एक साझा परीक्षा व्यवस्था लागू हुई. आलोचकों का कहना है कि अलग-अलग राज्य बोर्डों और पाठ्यक्रमों से आने वाले छात्रों को एक जैसी बहुविकल्पीय परीक्षा में आंकना समान अवसर की गारंटी नहीं देता.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के लिए एक व्यापक नियामक ढांचे का प्रस्ताव भी है. आलोचना यह है कि इससे नियमन, मान्यता, वित्त पोषण और अकादमिक मानक तय करने की शक्तियां एक केंद्रीय ढांचे में सिमट सकती हैं.

विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर भी राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव के आरोप सामने आए हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह, पूर्व जेएनयू कुलपति एम. जगदीश कुमार और वर्तमान जेएनयू कुलपति शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित को लेकर ऐसे संबंधों पर सार्वजनिक बहस हुई है. पंडित ने 2024 में आरएसएस से अपने जुड़ाव पर गर्व जताया था.

पाठ्यक्रम में बदलाव और शिक्षा का कमजोर होना

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में बहुविषयक शिक्षा पर जोर दिया गया है. आलोचकों का कहना है कि इससे छात्रों को अपने मुख्य विषय के अध्ययन के लिए मिलने वाला समय कम हो रहा है और पाठ्यक्रम में 'वैदिक गणित', 'आर्ट ऑफ बीइंग हैप्पी' और 'हैप्पीनेस एंड वेलबीइंग' जैसे विषयों का हिस्सा बढ़ा है.

बहुस्तरीय प्रवेश और निकास व्यवस्था के तहत छात्र एक वर्ष बाद प्रमाणपत्र, दो वर्ष बाद डिप्लोमा और तीन वर्ष बाद सामान्य डिग्री लेकर पढ़ाई छोड़ सकते हैं, जबकि चार वर्ष पूरे करने पर ऑनर्स डिग्री मिलती है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया के शिक्षक डॉ. देबादित्य भट्टाचार्य ने इसे "ड्रॉपआउट का संस्थानीकरण" बताया है. उनके मुताबिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों की समस्या का समाधान करने के बजाय यह व्यवस्था शुरुआती निकास को औपचारिक रूप देती है.

शिक्षा का बढ़ता भगवाकरण

लेख में शिक्षा व्यवस्था में "भारतीयकरण" और भारतीय ज्ञान प्रणाली के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. आलोचना है कि इतिहास और संस्कृति को एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण से दोबारा प्रस्तुत किया जा रहा है.

एनसीईआरटी की किताबों से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े कई हिस्सों को हटाने, गुजरात दंगों, बाबरी मस्जिद विध्वंस और गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंध से संबंधित सामग्री में बदलाव को इसी बहस का हिस्सा माना गया है.

अल्पसंख्यक संस्थानों को लेकर भी कई विवाद सामने आए हैं. उत्तर प्रदेश में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के खिलाफ सरकारी कार्रवाई और जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम छात्रों की अधिक संख्या के बाद श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस की एमबीबीएस मान्यता वापस लिए जाने के मामले का उल्लेख किया गया है.

जामिया में 2026 में आरएसएस के युवा कुंभ आयोजन और कुलपति मजहर आसिफ की "सभी भारतीयों के डीएनए में महादेव" वाली टिप्पणी पर भी विवाद हुआ. वहीं, दिसंबर 2025 में प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी शाहरे को भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार से संबंधित परीक्षा प्रश्न के बाद निलंबित किया गया था.

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी द्वारा जादवपुर विश्वविद्यालय के बाहर निकाली गई 'गेरुआ सम्मान यात्रा' को भी विश्वविद्यालयों में वैचारिक हस्तक्षेप की बहस से जोड़ा गया है.

विश्वविद्यालय ऐसे संस्थान हैं जहां युवा स्वतंत्र रूप से सवाल पूछना, तर्क करना और सत्ता की नीतियों की आलोचना करना सीखते हैं. इसलिए उनकी स्वायत्तता केवल शिक्षा का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज में विचार और असहमति की जगह से भी जुड़ी है. अकादमिक स्वतंत्रता पर बढ़ते नियंत्रण की बहस इसी बुनियादी सवाल के इर्द-गिर्द है कि विश्वविद्यालय ज्ञान और आलोचनात्मक सोच के स्वतंत्र केंद्र बने रहेंगे या धीरे-धीरे राजनीतिक और वैचारिक नियंत्रण के दायरे में आते जाएंगे.

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