अशोक पांडे | आज जब वो नहीं हैं खुद को बहुत बेचारगी से भरा पा रहा हूँ.
बशीर बद्र उसी नए मिजाज़ के शहर के शायर थे जहाँ तपाक से गले मिलने वाले को कोई हाथ मिलाने वाला भी नसीब न था. अपनी शायरी के कहन में उन्होंने जो नायाब नयापन हासिल किया था, उसका उन्हें गुमान था. जिस इमेजरी को वे अपनी ग़ज़लों में जगह दे रहे थे, वह किस कदर अद्वितीय और मॉडर्न थी, उन्हें इसका भी अहसास था.

