अशोक पांडे | आज जब वो नहीं हैं खुद को बहुत बेचारगी से भरा पा रहा हूँ.

बशीर बद्र उसी नए मिजाज़ के शहर के शायर थे जहाँ तपाक से गले मिलने वाले को कोई हाथ मिलाने वाला भी नसीब न था. अपनी शायरी के कहन में उन्होंने जो नायाब नयापन हासिल किया था, उसका उन्हें गुमान था. जिस इमेजरी को वे अपनी ग़ज़लों में जगह दे रहे थे, वह किस कदर अद्वितीय और मॉडर्न थी, उन्हें इसका भी अहसास था. तभी तो कहते थे-

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ

वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया न कहा हुआ न सुना हुआ

वफ़ा, दोस्ती, गिला, शिकवा, बिछोह, दुःख, जीवन, मृत्यु जैसी उन सारी सार्वभौमिक थीम्स को उन्होंने अपनी दोस्ताना ज़बान के रास्ते एकदम नया बाना पहनाया जिन्हें उर्दू शायरी लाख तरीकों से दोहरा चुकी थी. 

यह उनकी कविता की सरल, आमफ़हम ज़बान ही थी कि अपने मन की बात कहने को लोग कभी न कभी उनके शेर उद्धृत करने से ख़ुद को रोक नहीं पाते थे. वे बेशक हमारे समय के सबसे लोकप्रिय कवियों में थे. मुशायरों में उन्हें सुनने-देखने आने वालों का रेला उमड़ पड़ता था. 

एक बरस नैनीताल के फ्लैट्स में हुए मुशायरे में आए थे. मंच पर माइक के आगे खड़े आदमी को सामने स्नो-व्यू की पहाड़ी नज़र आती थी, जिस पर रोपवे चला करती है. 

कॉलेज के शुरुआती दिन थे. 1980 की दहाई का कोई साल. अक्टूबर का महीना था. नैनीताल में ऑटम-फेस्टिवल का माहौल था. मुशायरा उस फेस्टिवल के सबसे लोकप्रिय आयोजनों में गिना जाता था. ऐसा लगता था सारा शहर वहां मौजूद था. पैविलियन की सीढ़ियों पर अपने दोस्तों के साथ मैं भी बैठा था. तमाम शायर मोहब्बत-आशिकी वगैरह की शायरी सुना रहे थे. उम्र ऐसी थी कि वह सब अच्छा ही लगना था.

फिर बशीर बद्र आए. मैंने बशीर बद्र का नाम तब तक नहीं सुन रखा था. अपनी खुली-खड़ी आवाज़ में उन्होंने पढ़ना शुरू किया. एकदम अलग लहज़ा – वही धूप की पत्तियों में बंधे रिबन वाला. एक शेर आया –

वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का

रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुशबू

कान चौकन्ने हो गए. भीतर कोई चीज़ एकदम अपनी सी लगने लगी. अचानक उधर मस्जिद से मगरिब की अजान उठी. बशीर बद्र कुछ देर चुप रहे. फिर अगला शेर पढ़ा –

गुलों पे लिखती हुई ला-इलाहा-इल्लल्लाह

पहाड़ियों से उतरती अज़ान की ख़ुशबू

मैंने इस बशीर बद्र को सबसे पहले जाना. और उसके बाद जहाँ-जहाँ उनकी किताबें मिलीं, उन्हें इकठ्ठा किया – पढ़ा, गुना, खुश हुआ किया. एक वह शेर भी याद रह गया जिसमें बड़ी विनम्रता से कहते हैं –

सितारे राह के हैं मीर-ओ-ग़ालिब-ओ-इक़बाल

क़लम बच्चे का हूँ तख़्ती नई नई हूँ मैं  

फिर कई बरस बाद उड़ती उड़ती बात सुनी कि बद्र साहब ने अपने आप को ग़ालिब और मीर से बड़ा शायर बताया है. बड़ा दिल टूटा. तब तक इंटरनेट आ चुका था. उनके कुछ इंटरव्यू देखे. वे अपने जीनियस की ऊंचाई से उतर चुके थे, उसकी ही छाया में जीते नज़र आते थे. पता नहीं क्यों बशीर बद्र से जी उखड़ सा गया. वह तिलिस्म भी बिलाने लगा जो उस जादुई शाम उन्होंने नैनीताल में मेरे ऊपर बांधा था.  

कभी उनके घर पर हुए हमलों की खबरें आतीं, कभी उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता को लेकर लोग सवाल उठाते, कोई कहता बशीर बद्र नकचढ़े हैं, कोई उन्हीं कुछ कहता, कोई कुछ. मेरा उखड़ा हुआ जी और उखड़ता जाता.

उनके न रहने की खबर के बाद से लगातार उनके बारे में सोच रहा हूँ. खराब लग रहा है. जैसे कोई अपना रुखसत हो गया हो. मुझे बशीर बद्र के बारे में उड़ाई गई सच्ची-झूठी बातों से ज़रा भी प्रभावित नहीं होना चाहिए था. 

उनसे मुलाक़ात न होनी थी, न अब होने की कोई सूरत बची. नकचढ़े भी थे तो क्या! उस दर्जे की शायरी लिख सकने वाले का खुद पर गुमान करना बनता है. मेरा क्या ले जाते बेचारे! जो लिया मैंने ही लिया. जो सीखा मैंने ही उनकी ज़बान से सीखा. दुनिया-जहान में उनके शेर सुना कर को दाद मिली, उसका लुत्फ़ मैंने ही उठाया. 

आज जब वो नहीं हैं खुद को बहुत बेचारगी से भरा पा रहा हूँ. उनके सामने जा कर माफ़ी भी नहीं मांग सकता. और वो आदमी ऐसा मुलायम लिख सकता था – 

मोहब्बत से, इनायत से, वफ़ा से चोट लगती है

बिखरता फूल हूँ मुझ को हवा से चोट लगती है

और न लिखा जा सकेगा.

अलविदा बशीर साहब.


Previous
Previous

नवशरण सिंह | नोएडा के मजदूर सिर्फ वेतन नहीं, सम्मान और गरिमा की लड़ाई लड़ रहे हैं

Next
Next

“वोटर लिस्ट से नागरिकता तक”: सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर फ़ैसले ने क्यों बढ़ा दी देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक बहस?