एसआइआर से सीआरपीएफ तक: वे पाँच कारक जिन्होंने बंगाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित की
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का संकेत देता है. जिस राज्य में लंबे समय तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, वहां भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार दो-तिहाई बहुमत के साथ जीत दर्ज की. यह जीत अचानक नहीं आई, बल्कि कई रणनीतिक, सामाजिक और संस्थागत कारकों के संयोजन का परिणाम है. इन कारकों को समझे बिना इस जनादेश का सही विश्लेषण संभव नहीं है.
“वोट देने के लिए भरोसा नहीं, लेकिन चुनाव कराने के लिए उन पर पूरा भरोसा है” : बंगाल के चुनाव अधिकारी जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए
जो सरकारी कर्मचारी दशकों से चुनाव ड्यूटी में तैनात होकर लोकतंत्र के इस महापर्व को संपन्न कराने में अपना योगदान देते रहे हैं, “एसआईआर” के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से उन्हें बाहर कर दिया गया है. दुखद यह है कि कहीं उनकी सुनवाई नहीं हुई है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में अत्री मित्रा की यह रिपोर्ट मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सवाल उठाती है. यह दिखाती है कि कैसे सिस्टम की खामियों के कारण स्वयं 'सिस्टम के रक्षक' (चुनाव अधिकारी) ही 2026 के विधानसभा चुनावों में लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रह गए हैं.
भाजपा की योजनाओं पर हिटलर की छाप: बेबी ने ‘एसआईआर’ को हिंदुत्व की बड़ी योजना का हिस्सा बताया
माकपा (सीपीएम) पोलित ब्यूरो सदस्य एम.ए. बेबी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिस तरह से नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), जनगणना मूल्यांकन प्रक्रिया, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और परिसीमन का उपयोग एक "फासीवादी, बहुसंख्यकवादी हिंदू राष्ट्र" स्थापित करने के लिए कर रहे हैं, उसमें एडोल्फ हिटलर के शासनकाल की छाप दिखाई देती है.

