“वोट देने के लिए भरोसा नहीं, लेकिन चुनाव कराने के लिए उन पर पूरा भरोसा है” : बंगाल के चुनाव अधिकारी जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए
यह कैसी विडंबना है कि जो सरकारी कर्मचारी दशकों से चुनाव ड्यूटी में तैनात होकर लोकतंत्र के इस महापर्व को संपन्न कराने में अपना योगदान देते रहे हैं, “एसआईआर” के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से उन्हें बाहर कर दिया गया है. दुखद यह है कि कहीं उनकी सुनवाई नहीं हुई है. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में अत्री मित्रा की यह रिपोर्ट मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सवाल उठाती है. यह दिखाती है कि कैसे सिस्टम की खामियों के कारण स्वयं 'सिस्टम के रक्षक' (चुनाव अधिकारी) ही 2026 के विधानसभा चुनावों में लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रह गए हैं.
56 वर्षीय अजीजुल हक़ लगभग तीन दशकों से पश्चिम बंगाल के विभिन्न चुनावों में 'पीठासीन अधिकारी' के रूप में कार्य कर रहे हैं. इस बार भी वे ड्यूटी पर हैं, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया है. वे उन 65 चुनाव अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी बेदखली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
सुप्रीम कोर्ट ने इन अधिकारियों की याचिका पर तुरंत हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और उन्हें 'ट्रिब्यूनल' के फैसले का इंतजार करने को कहा. अदालत ने कहा कि चूंकि चुनाव प्रक्रिया जारी है, इसलिए वे धीमी गति से चलने वाले ट्रिब्यूनल के माध्यम से ही अपनी शिकायत दर्ज कराएं.
हक़ जैसे कई सरकारी कर्मचारी, जिनमें फिरोज अली (सूती में पीठासीन अधिकारी), स्वाति मोल्ला (डोमकल में) और शाहिदुल इस्लाम (भगवानगोला में) शामिल हैं, इस स्थिति को "दुर्भाग्यपूर्ण" बता रहे हैं. उनका तर्क है कि जो लोग लोकतंत्र के पर्व को सफल बनाने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें ही मतदान से बाहर कर दिया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार, एसआईआर के तहत पश्चिम बंगाल में लाखों नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं. ट्रिब्यूनल के पास लगभग 34 लाख आवेदन लंबित थे, जिनमें से 23 अप्रैल (पहले चरण के मतदान) तक केवल 650 आवेदनों का निपटारा हो पाया और मात्र 139 नाम वापस जोड़े जा सके.
अधिकारियों का कहना है कि वे वर्षों से सरकारी सेवा में हैं और उनके पास सभी वैध दस्तावेज हैं, फिर भी एक "तर्कहीन" प्रक्रिया या सॉफ्टवेयर की त्रुटियों के कारण उन्हें मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है.

