एसआइआर से सीआरपीएफ तक: वे पाँच कारक जिन्होंने बंगाल में भाजपा की जीत सुनिश्चित की
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का संकेत देता है. जिस राज्य में लंबे समय तक वामपंथ और फिर तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, वहां भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार दो-तिहाई बहुमत के साथ जीत दर्ज की. यह जीत अचानक नहीं आई, बल्कि कई रणनीतिक, सामाजिक और संस्थागत कारकों के संयोजन का परिणाम है. इन कारकों को समझे बिना इस जनादेश का सही विश्लेषण संभव नहीं है.
एक अलग आवाज़: बंगाल बोल रहा है, भारत को सुनना चाहिए
‘द टेलीग्राफ’ में मनोज झा ने अंग्रेजी में लिखा है कि, 2026 की शुरुआत तक, भारतीय जनता पार्टी सीधे तौर पर 15 भारतीय राज्यों में शासन कर रही है, जबकि उसका राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 28 में से 19 राज्यों की सरकारों को नियंत्रित करता है और लोकसभा की 293 सीटों पर काबिज है, जो सदन का 54% है. स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में कांग्रेस के प्रभुत्व के बाद से किसी भी राजनीतिक दल ने भारत के संघीय परिदृश्य के इतने बड़े हिस्से पर एक साथ नियंत्रण नहीं किया है. अपने मूल में, बंगाल इस बात की परीक्षा ले रहा है कि क्या एक मजबूत क्षेत्रीय दल के नेतृत्व वाला गर्वित प्रगतिशील राज्य भाजपा के निरंतर विस्तार का सामना कर सकता है, और क्या भारत के संघीय लोकतंत्र में अब भी कोई सार्थक बहुलता बची है.

