एक अलग आवाज़: बंगाल बोल रहा है, भारत को सुनना चाहिए
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में क्या दांव पर लगा है, इसे समझने के लिए एक उपयोगी वैचारिक प्रयोग किया जा सकता है. एक ऐसे राज्य की कल्पना कीजिए जो लगभग दो शताब्दियों से भारतीय आधुनिकता की प्रमुख प्रयोगशालाओं में से एक रहा है: वह स्थान जो ‘बंगाल पुनर्जागरण’ का केंद्र रहा, राजा राममोहन राय के सुधारवाद का, टैगोर के विश्वव्यापी बहुलवाद का, सुभाष चंद्र बोस के प्रखर उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का और वामपंथी मोर्चे के तीन दशक लंबे चुनावी मार्क्सवाद के प्रयोग का साक्षी रहा. अब कल्पना कीजिए कि उस प्रयोगशाला की व्यवस्थित रूप से घेराबंदी की जा रही है. यह चुनाव यह सवाल खड़ा करता है कि क्या नागरिकों के नेतृत्व वाली राजनीति की एक विशिष्ट और तर्कपूर्ण परंपरा, संस्थागत शक्ति के उस सबसे केंद्रीकृत जमावड़े के सामने जीवित रह सकती है, जैसा भारत ने आपातकाल के बाद से नहीं देखा है.
‘द टेलीग्राफ’ में मनोज झा ने अंग्रेजी में लिखा है कि, 2026 की शुरुआत तक, भारतीय जनता पार्टी सीधे तौर पर 15 भारतीय राज्यों में शासन कर रही है, जबकि उसका राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 28 में से 19 राज्यों की सरकारों को नियंत्रित करता है और लोकसभा की 293 सीटों पर काबिज है, जो सदन का 54% है. स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में कांग्रेस के प्रभुत्व के बाद से किसी भी राजनीतिक दल ने भारत के संघीय परिदृश्य के इतने बड़े हिस्से पर एक साथ नियंत्रण नहीं किया है. अपने मूल में, बंगाल इस बात की परीक्षा ले रहा है कि क्या एक मजबूत क्षेत्रीय दल के नेतृत्व वाला गर्वित प्रगतिशील राज्य भाजपा के निरंतर विस्तार का सामना कर सकता है, और क्या भारत के संघीय लोकतंत्र में अब भी कोई सार्थक बहुलता बची है.
मैंने अन्यत्र जिसे ‘तथ्यों की परिणति का न्यायशास्त्र’ कहा है—अर्थात संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग कानून की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक परिणाम गढ़ने और फिर उन परिणामों को जमीनी हकीकत के रूप में पेश करने के लिए करना—उसे बंगाल के खिलाफ विशेष तीव्रता के साथ तैनात किया गया है. भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) अत्यंत विवादास्पद हो गया है, जिसमें बड़े पैमाने पर जांच और नाम हटाए जाने की खबरें हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) सक्रिय रहे हैं. भाजपा ने भ्रष्टाचार के मामलों को शासन की व्यवस्थागत विफलता के प्रमाण के रूप में पेश किया है; वहीं तृणमूल कांग्रेस ने राजनीतिक रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाकर इसका मुकाबला किया है, जिससे जांच की कार्रवाई ही एक राजनीतिक मुद्दा बन गई है. पश्चिम बंगाल में, टीएमसी खुद को भाजपा के विस्तार का विरोध करने वाले अंतिम प्रमुख पूर्वी गढ़ के रूप में पेश करती है, और यह चुनावी रूप से पहले भी प्रभावी साबित हुआ है. यह लचीलापन इस तथ्य से उपजा है कि राजनीतिक चेतना, जब एक बार सामाजिक जीवन के कण-कण में बस जाती है, तो उसे संस्थागत हेरफेर के माध्यम से दरकिनार करना कठिन होता है.
2021 के अभियान के दौरान लगभग हर राजनीतिक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बार-बार अब कुख्यात हो चुके जुमले “दीदी, ओ दीदी” से संबोधित किया था. इस फब्ती को उस राज्य की महिलाओं ने पसंद नहीं किया जहाँ सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की परंपराएँ गहरी हैं. बंगाल ने मतपेटी के माध्यम से इसका जवाब दिया, क्योंकि वह कटाक्ष एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति से टकराया था जो ‘तर्क’ को जीवन जीने के तरीके के रूप में महत्व देती है. जैसा कि अमर्त्य सेन, राजा राममोहन राय का हवाला देते हुए याद करते हैं—बंगाली कल्पना में मृत्यु का वास्तविक भय ‘वापस तर्क न कर पाने’ की अक्षमता में निहित है. प्रतिक्रिया देने की गरिमा से वंचित किया जाना, एक तरह से, मौन रहकर अस्तित्वहीन हो जाने के समान है.
एक ऐसा समाज जिसने ऐतिहासिक रूप से तर्कसंगत असहमति को अपने बौद्धिक और राजनीतिक जीवन के केंद्र में रखा है, वह तिरस्कार या उपहास का सहजता से उत्तर नहीं देता. यह असुविधा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत भी थी. महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा की इस बार रणनीति बदली हुई प्रतीत होती है, और वह मुख्यमंत्री पर सीधे व्यक्तिगत हमलों से काफी हद तक बच रही है.
बंगाल क्यों अलग है, इसे समझने के लिए हमें अमर्त्य सेन के प्रसिद्ध विचार ‘द आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन’ (तर्कशील भारतीय) से शुरुआत करनी होगी. यह विचार भारतीय बौद्धिक जीवन के दो सहस्राब्दियों के इतिहास से निकला है, जो कहता है कि सार्वजनिक तर्क और लोकतांत्रिक असहमति कोई पश्चिमी आयात नहीं, बल्कि हमारी अपनी मानसिक आदतें हैं. सेन का तर्क है कि यह परंपरा भारत के लोकतंत्र की सफलता, धर्मनिरपेक्ष राजनीति की रक्षा, वर्ग, जाति, लिंग और समुदाय से जुड़ी असमानताओं के उन्मूलन और उपमहाद्वीपीय शांति की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. बंगाल इस परंपरा की सबसे निरंतर संस्थागत अभिव्यक्ति रहा है. इसने हमें ‘अड्डा’ दिया—अनौपचारिक लेकिन राजनीतिक रूप से चार्ज की गई बातचीत का वह जमावड़ा, जो किसी भी समाचार पत्र या संसद की तरह ही सार्वजनिक क्षेत्र का एक स्वरूप है. बंगाली जीवन के हर क्षेत्र—साहित्य, सिनेमा, वाणिज्य और घरेलू दायरे—में राजनीति का समावेश एक सभ्यतागत उपलब्धि है.
बंगाल में गहन वैचारिक राजनीति की एक लंबी परंपरा रही है, जो वामपंथी मोर्चे के 34 साल के शासन से वर्तमान टीएमसी के प्रभुत्व तक पहुँची है. राजनीतिक ध्रुवीकरण यहाँ स्थायी सामाजिक कलह पैदा करने में शायद ही कभी सफल रहा है, क्योंकि बंगाल में ध्रुवीकरण को पारंपरिक रूप से विचारों के आदान-प्रदान के रूप में अपनाया गया है. यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में बंगाल को भारत का “सबसे ध्रुवीकृत राज्य” बताया जाना भी इस इतिहास को गलत तरीके से पढ़ना है. किसी बहस या तर्क को ‘बीमारी’ की तरह देखना दरअसल एक जीवित लोकतंत्र को ‘विकार’ समझने की भूल करना है जिसे प्रबंधन की आवश्यकता हो.
उदारवादी टीकाकार—संपादकीय लेखकों और अर्थशास्त्रियों का वह समूह जो वितरणात्मक न्याय के ऊपर बाजार की दक्षता का जश्न मनाता है—लंबे समय से बंगाल की राजनीति से असहज रहा है, और यह असुविधा काफी कुछ सिखाती है. जब यह समूह बंगाल के बारे में शिकायत करता है, तो उसका वास्तविक अर्थ यह होता है कि यह राज्य उस तरह के निर्बाध पूंजी संचय के लिए अनुकूल नहीं रहा है जिसे राष्ट्रीय कल्पना में ‘विकास’ माना जाता है. यहाँ श्रमिक आंदोलन ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है. बेदखली के लिए जमीन आसानी से उपलब्ध नहीं रही है. ‘अड्डा’ ने एक ऐसी नागरिकता तैयार की है जो विकास के उस मॉडल के बीच अंतर जानती है जो भूमि और श्रम को सस्ते में प्राप्त किए जाने वाले इनपुट के रूप में देखता है, और उस मॉडल के बीच जो इस बात पर जोर देता है कि जो जमीन के मालिक हैं और जो श्रम की आपूर्ति करते हैं, लेनदेन की शर्तों पर उनका प्राथमिक अधिकार है.
ये टीकाकार जिसे न कहना चुनते हैं, वह यह है कि बंगाल ने उत्तर-औपनिवेशिक भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण भूमि सुधार किए. वे इस तथ्य पर गंभीरता से विचार नहीं करते कि कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं विकास की एक ऐसी पुनर्व्याख्या हैं, जिसमें परिवार के आधार पर खड़ी महिला नीति की प्राथमिक इकाई है, न कि वैल्यू चेन के शीर्ष पर बैठा उद्योगपति. बंगाल में महिला साक्षरता, शिशु मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा में हुए सुधारों ने उन ऊंचाइयों को छुआ है जहाँ कई उच्च-विकास दर वाले राज्य नहीं पहुँच सके. तथ्य यह है कि भाजपा जैसी बाजार विचारधारा पर आधारित दक्षिणपंथी पार्टी को भी, चाहे वह चुनावी रणनीति के तहत ही क्यों न हो, इसी व्याकरण को अपनाना पड़ा है, जो हमें बताता है कि बंगाल ने वह बहस जीत ली है जिसे ये टीकाकार चाहते थे कि वह हार जाए.
देश और दुनिया में बिखरा हुआ ‘प्रवासी’ बंगाली अक्सर पुरानी यादों और अलगाव के बीच झूलता रहता है. लेकिन यह अलगाव अब एक ऐसी विलासिता है जिसे यह समय बर्दाश्त नहीं कर सकता. बंगाल में अभी इस बात पर संघर्ष हो रहा है कि क्या भारत का संघीय लोकतंत्र वास्तविक बहुलवाद को बनाए रख सकता है, या यह एक प्रबंधित एकरूपता में बदल जाएगा जहाँ हर सार्वजनिक क्षेत्र को एक ही रंग में रंगा जाएगा. बंगाली प्रवासियों को इसका साक्षी बनना चाहिए. इसका दस्तावेजीकरण करें. अपने स्वयं के ‘अड्डों’ में इस पर बहस करें, चाहे वे आभासी ही क्यों न हों. तर्क करने की यह परंपरा कोई अवशेष नहीं है जिसे सहेज कर रखा जाए; यह एक जीवित अभ्यास है जिसे निरंतर करना होगा, अन्यथा यह समाप्त हो जाएगी. जैसा कि 2004 के चुनावों से ठीक पहले एक बंगाली ग्रामीण ने अमर्त्य सेन से कहा था: “हमें चुप कराना बहुत कठिन नहीं है, लेकिन ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि हम बोल नहीं सकते.”
बंगाल बोल रहा है. गणतंत्र को सुनना चाहिए.
(लेखक मनोज कुमार झा राज्यसभा सांसद, राष्ट्रीय जनता दल हैं)

