इंडिपेंडेंट | ज्ञानेश कुमार का बचाव करने के लिए सरकार इतनी प्रतिबद्ध क्यों है
भारत में मतदाता सूचियों से कथित तौर पर लगभग 13 करोड़ (130 मिलियन) मतदाताओं के नाम हटाए जाने के गंभीर आरोपों के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शनों का एक नया और आक्रामक दौर शुरू हो गया है. विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक समाज समूहों का आरोप है कि यह पूरी कवायद केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को चुनावी फायदा पहुँचाने के उद्देश्य से की गई है.
इस विवाद के केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं, जिनके इस्तीफे की मांग को लेकर हाल के दिनों में राजधानी नई दिल्ली की सड़कों पर विशाल प्रदर्शन देखने को मिले हैं.
प्रशासन ने इस जन-उभार से निपटने के लिए कड़ा रुख अपनाया है. राजधानी के प्रमुख रास्तों और सड़कों पर कड़े अवरोधक (बैरिकेड्स) खड़े कर दिए गए हैं. कई संवेदनशील इलाकों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं ठप्प कर दी गई हैं. हजारों पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के साथ-साथ नेताओं, छात्रों, कार्यकर्ताओं और वकीलों को बड़े पैमाने पर हिरासत में लिया गया है.
हाल ही में पुलिस ने एक ही हफ्ते में दूसरी बार 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेताओं को हिरासत में लिया. यह वही युवा संगठन है जिसने इस साल की शुरुआत में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और गड़बड़ियों के खिलाफ अभूतपूर्व आंदोलन खड़ा किया था, जिसके दबाव में आकर तत्कालीन शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. “इंडिपेंडेंट” में नमिता सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय राजनीति में किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा एक विरली घटना मानी जाती है; लिहाजा, यह घटनाक्रम साल 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक अधिकार और सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनकर उभरा.
सरकार का कड़ा रुख और चुनाव आयोग की दलीलें
इस भारी विरोध के बावजूद केंद्र सरकार अपने रुख पर अड़ी हुई है और प्रदर्शनकारियों को जमा होने देने के बजाय पूरी राजधानी को एक तरह से छावनी में तब्दील कर चुकी है. हालांकि, इस दमनकारी कार्रवाई से न तो विरोध प्रदर्शन थमे हैं और न ही युवाओं के भीतर पनप रहा गुस्सा.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व प्राध्यापक और प्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धांतकार प्रोफेसर राजीव भार्गव के अनुसार, मुख्य मुद्दा केवल एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं है, बल्कि यह है कि सरकार उनका बचाव करने के लिए इतनी आक्रामक क्यों है.
भार्गव कहते हैं: "एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जैसे ही किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह पैदा होता है, जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से तुरंत इस्तीफा ले लिया जाता. चुनाव आयोग का बुनियादी काम निष्पक्ष चुनाव कराना है; लेकिन जब उसकी अपनी वैधता ही कटघरे में हो, तो निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद नहीं की जा सकती. "
'द इंडियन एक्सप्रेस' की खोजी रिपोर्ट ने संदेहों को और पुख्ता कर दिया है. हालांकि आयोग ने इसे प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहा है कि 13 करोड़ नामों का वर्गीकरण केवल मृत, स्थानांतरित या दोहरे प्रविष्टियों वाले मतदाताओं की पहचान के लिए था और पात्र नागरिक पुनः आवेदन कर सकते हैं. लेकिन आलोचकों का तर्क है कि प्रक्रिया की जटिलता और माँगे जा रहे दस्तावेज़ रणनीतिक रूप से लाखों पात्र नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने का प्रयास लगते हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद मानते हैं कि ज्ञानेश कुमार इस पूरी व्यवस्था में महज एक मोहरा हैं, जिसके जरिए चुनावी प्रक्रिया को बीजेपी के अनुकूल मोड़ने की कोशिश की जा रही है. सरकार के इस जिद्दी रवैये ने चुनावी प्रशासन के साधारण विवाद को संवैधानिक और संस्थागत विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा में बदल दिया है.
भार्गव और अपूर्वानंद के अनुसार सरकार को डर है कि यदि वे ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा स्वीकार करते हैं, तो यह उनकी गलती का प्रत्यक्ष स्वीकारनामा माना जाएगा. साथ ही, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि नया आयुक्त उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा.
प्रोफेसर अपूर्वानंद का मानना है कि भारी सुरक्षा बलों की तैनाती वास्तव में बीजेपी के कोर समर्थकों को यह संदेश देने की रणनीति है कि सरकार का नियंत्रण पूरी तरह कायम है और वह किसी दबाव के आगे झुकने वाली नहीं है.
इस आंदोलन की तुलना स्वाभाविक रूप से जुलाई में हुए उस छात्र आंदोलन से की जा रही है, जिसने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद छोड़ने पर मजबूर कर दिया था.
प्रोफेसर भार्गव के अनुसार, जुलाई में सरकार को पीछे हटने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ा था क्योंकि पुलिस बर्बरता के कारण युवा मतदाताओं की एक पूरी पीढ़ी के हमेशा के लिए छिटक जाने का जोखिम पैदा हो गया था. उस समय 'जेन-जी' के अनौपचारिक तौर-तरीकों, तीखे व्यंग्य (सटायर) और डिजिटल अभियानों ने परंपरागत राजनीतिक दलों की सीमाओं को लांघकर जन-आंदोलन खड़ा कर दिया था, जिसने राहुल गांधी और मुख्य विपक्ष के लिए एक मजबूत मंच तैयार किया.
जुलाई आंदोलन बनाम वर्तमान गतिरोध
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि जब जुलाई में सरकार ने दमन का रास्ता चुना, तो युवाओं ने शासन का असली चेहरा देख लिया और वे विपक्ष की बात ध्यान से सुनने लगे.
हालांकि, मौजूदा स्थिति जुलाई की तुलना में अधिक जटिल और दीर्घकालिक है. जुलाई में सरकार यह संदेश दे सकती थी कि वह छात्रों और युवाओं की मांग सुन रही है. लेकिन इस बार मुद्दा सीधे तौर पर देश की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का है.
अपूर्वानंद के मुताबिक, यदि सरकार इस मुद्दे पर वार्ता की मेज पर आती है, तो उसे राहुल गांधी और मुख्य विपक्षी नेताओं को देश के वैध राजनीतिक वार्ताकार के रूप में स्वीकार करना होगा—एक ऐसी स्थिति जिससे बीजेपी बीते 12 वर्षों के शासनकाल में हमेशा बचती आई है.
कुलमिलाकर, यह मुकाबला अब केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के पद या चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रह गया है; यह अब सीधे तौर पर सरकार बनाम जनता के बीच लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की एक लंबी और कठिन लड़ाई में बदल चुका है.
(यह हिंदी में अनूदित सारांश है. नमिता सिंह की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है)

