देवी कर | जब पीढ़ियों का अंतर चौड़ा हो जाता है

सदियों से एक पीढ़ी द्वारा अपनी अगली पीढ़ी की आलोचना करना एक आम प्रथा रही है. लेकिन सवाल यह उठता है कि "क्या हाल के दिनों में पीढ़ियों के बीच की दूरी (जनरेशन गैप) पहले से कहीं अधिक चौड़ी हो गई है?" जुलाई में देश को हिला देने वाले युवा विरोध प्रदर्शनों के बाद से यह विचार बार-बार मेरे मन में घूम रहा है. उन घटनाओं के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि हमारी व्यवस्था और पुरानी पीढ़ी में युवाओं के प्रति संवेदनशीलता और गहरी समझ की भारी कमी है.

‘द टेलीग्राफ’ में देवी कर लिखती हैं कि जब देश के युवा और बच्चे उस बात से आहत या आक्रोशित होते हैं जिसे वे 'पुरानी पीढ़ी'—विशेषकर देश के राजनीतिक नेतृत्व—द्वारा दिया गया धोखा मानते हैं, तो उनके प्रति अहंकारी या उपदेशात्मक रवैया अपनाना एक भारी भूल है. उनसे विरोधियों की तरह व्यवहार करना तो स्थिति को और बिगाड़ देता है. युवा प्रदर्शनकारियों के साथ (जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में) जिस तरह की कड़वाहट भरा बर्ताव देखा गया, वह सचमुच चिंताजनक था.

लेखिका के अनुसार, स्कूलों के शिक्षकों और शिक्षाविदों को भी आने वाली नई पीढ़ियों को समझने के लिए खुद को तैयार करना होगा. वर्तमान में शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में दिया जाने वाला शैक्षणिक मनोविज्ञान का ज्ञान इस आधुनिक चुनौती का सामना करने के लिए बेहद अपर्याप्त है. आज जनरेशन जेड और जनरेशन के साथ एक सार्थक संबंध बनाना आसान नहीं रह गया है, और जनरेशन बीटा का व्यवहार कैसा होगा, यह देखना अभी बाकी है.

अब बच्चों में वैचारिक स्वतंत्रता और तार्किकता किशोरावस्था से काफी पहले दिखने लगती है. हाल ही में, मैंने एक सात साल के बच्चे को अपनी मां के साथ किसी परिपक्व वकील की तरह तर्क-वितर्क करते देखा. उसने अपने तर्कसंगत जवाबों से मां को इस कदर थका दिया कि अंततः मां के पास उसे डांटकर चुप कराने के अलावा कोई चारा नहीं बचा.

पिछले दिनों मुझे 11वीं कक्षा की छात्राओं से संवाद करने का अवसर मिला. हमारी बातचीत हालिया युवा प्रदर्शनों और उस पर वयस्कों की प्रतिक्रियाओं से शुरू होकर पीढ़ियों के अंतर पर केंद्रित हो गई. एक छात्रा ने बेहद बेबाकी से कहा, "हमें राजनीतिक दलों या नेताओं से कोई मतलब नहीं है, न ही हमें उन पर भरोसा है; हम केवल वास्तविक समस्याओं और जन-मुद्दों को लेकर चिंतित हैं."

छात्राओं ने साझा किया कि जब वे प्रश्न-पत्र लीक होने जैसे ज्वलंत विषयों पर सवाल उठाती हैं, तो उनके माता-पिता असहज हो जाते हैं.  उन्हें लगता है कि बच्चे अप्रत्यक्ष रूप से उस राजनीतिक दल पर हमला कर रहे हैं, जिसके प्रति वे खुद वफादार हैं. छात्राओं ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि वे अपने माता-पिता और पुरानी पीढ़ी से कटाव महसूस करती हैं, क्योंकि दोनों पीढ़ियों के बीच अब निष्पक्ष और सार्थक बातचीत लगभग खत्म हो चुकी है. युवाओं के लिए चुनाव केवल 'कम बुरे विकल्प' को चुनने जैसा है, लेकिन पुरानी पीढ़ी उनकी इस सोच को समझ नहीं पाती.

हालांकि हर दौर में पीढ़ियों के विचार अलग रहे हैं, लेकिन जनरेशन जेड और मिलेनियल्स के बीच का वैचारिक अंतर काफी बड़ा दिखता है. अतीत में बहसें प्रायः पहनावे, दोस्तों के चयन, फिल्मों या मिलने वाली छूट की सीमा तक सीमित होती थीं. लेकिन आज तकनीक और समाज में इतनी तीव्र गति से बदलाव आ रहे हैं कि कई माता-पिता के लिए बच्चों की मानसिकता को समझ पाना कठिन हो गया है.

पालन-पोषण का कोई एक आदर्श फॉर्मूला नहीं होता, फिर भी नई पीढ़ी के साथ आत्मीयता बनाए रखने के लिए कुछ मूल सिद्धांतों पर ध्यान दिया जा सकता है: बच्चों से केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि विविध विषयों पर खुलकर चर्चा करें. उनकी रुचियों और प्राथमिकताओं को समझने में वास्तविक उत्सुकता दिखाएं, उन्हें नीचा दिखाने या उनसे बहस में जीतने के बजाय उनके दृष्टिकोण को सहानुभूतिपूर्वक सुनें और यदि माता-पिता के रूप में आपसे कोई गलती या अन्याय हुआ हो, तो बेझिझक 'सॉरी' (क्षमा) कहें.

17-18 वर्ष के युवाओं के साथ उस सत्र के समापन पर एक छात्रा ने मुझसे पूछा, "क्या आपको लगता है कि जेन ज़ी एक शर्मनाक या गैर-जिम्मेदार पीढ़ी है?" जब मैंने इस बात को पूरी दृढ़ता से खारिज किया और कहा कि वे न तो बेवकूफ हैं और न ही निराशाजनक, तो उनके चेहरों पर आई राहत और खुशी देखने लायक थी. नई पीढ़ी को आलोचना की नहीं, बल्कि सही दिशा और सम्मानजनक संवाद की आवश्यकता है.

(लेखिका 'मॉडर्न हाई स्कूल फॉर गर्ल्स', कलकत्ता की निदेशक हैं. यहां प्रस्तुत है उनका हिंदी में अनूदित और संपादित लेख.)

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