यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि चुनाव आयोग में सर्वसम्मति से फैसले लिए गए थे तो फिर दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के बाद आयोग द्वारा सुधार के तमाम कदम क्यों उठाए गए, विशेषकर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में रीतिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद. चोपड़ा की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि घोषणापत्र को फॉर्म 6 के भीतर रखने के पीछे चुनाव आयोग का तर्क था कि इससे आवेदक का एक ओटीपी और ई-हस्ताक्षर बच जाता था. हालाँकि, 'द इंडियन एक्सप्रेस' की जाँच से पता चला कि चुनाव आयुक्त संधु और जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के नाम पर बिना उनकी जानकारी के लिए गए फैसलों पर आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं. ये आपत्तियाँ मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने-बहाल करने, अपीलों, मतदाता सूची सॉफ्टवेयर के नियंत्रण और वरिष्ठ अधिकारियों के कार्य आवंटन जैसे मुख्य मुद्दों से जुड़ी थीं.
14 में से 5 नोट मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भेजे गए थे, लेकिन उन पर कोई प्रतिक्रिया दर्ज नहीं हुई. मई से अगस्त के बीच पूर्ण आयोग की एक भी बैठक नहीं हुई. 23 सितंबर को आयोग ने इन नोट्स को केवल 'सुझाव' बताया, लेकिन आयुक्तों द्वारा उठाए गए लगभग हर मुद्दे पर अगले पाँच हफ्तों में सुधारात्मक कदम उठाए:
बैठकें एवं विदेश यात्रा: अब हर बैठक से पहले एजेंडा और बाद में मिनट्स जारी किए जाएंगे. अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए आयोग की पूर्व मंज़ूरी अनिवार्य कर दी गई है.
आईटी सिस्टम एवं ईसीआईनेट का ऑडिट: नए आईटी मॉड्यूल अब अधिकारियों की समिति और आयोग की मंज़ूरी के बाद ही लागू होंगे. 14 अक्टूबर को एक समिति गठित कर ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर के नियमों के अनुपालन की जाँच शुरू की गई है.
मैदानी अधिकारियों के अधिकार: ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर में बदलाव कर ज़मीनी अधिकारियों (ईआरओ, डीईओ) के अधिकार बहाल किए गए हैं. नोटिस प्राप्त मतदाताओं की व्यक्तिगत सुनवाई अब अपवाद होगी और बीएलओ घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे. 13 तय श्रेणियों के बाहर के दस्तावेज भी स्वीकार होंगे तथा पिछली एसआईआर सूची अपलोड करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है.
गोवा के 97 मतदाता: तकनीकी खामी (सॉफ्टवेयर में विलोपन रद्द करने का विकल्प न होना) के कारण अंतिम सूची से छूटे गोवा के 97 योग्य मतदाताओं को फिर से जोड़ने के निर्देश दिए गए हैं. इनमें से 88 के फॉर्म 6 स्वीकार कर लिए गए हैं.
पश्चिम बंगाल अपीलों पर स्थिति: न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ दायर लाखों अपीलों पर संधु द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में आयोग ने कहा कि अधिकारियों को अपील दायर करने के लिए अलग से अधिकार पत्र की आवश्यकता नहीं थी. यह कार्रवाई बंगाल सीईओ (मुख्य निर्वाचन अधिकारी) कार्यालय के अधिकारियों द्वारा की गई थी. हालाँकि, ये अपीलें वापस नहीं ली गई हैं और संबंधित मतदाताओं ने हालिया चुनावों में मतदान किया है.
इस पूरे घटनाक्रम के बावजूद, अदालत में आयोग का रुख यही रहा कि कुछ भी गलत तरीके से तय नहीं किया गया था. आयोग के अनुसार हलफनामा तीनों सदस्यों की सहमति से दायर हुआ था और सुधार केवल अधिकारियों स्तर पर उठाए गए कदमों को सही करने के लिए किए गए हैं.

