यूजी पाठ्यक्रमों में नामांकन पहली बार घटा, युवाओं में बढ़ती निराशा एक वजह, सर्वे में बदलते रुझान का खुलासा

उच्च शिक्षण संस्थानों में स्नातक (यूजी) कार्यक्रमों में नामांकन में पहली बार गिरावट आई है. विशेषज्ञ इस रुझान का कारण व्यावसायिक (वोकेशनल) शिक्षा पर सरकार के बढ़ते जोर, उच्च शिक्षा के महत्व को लेकर युवाओं में बढ़ती निराशा और जनसांख्यिकीय बदलावों को मान रहे हैं.

अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) की वर्ष 2022-23 और 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, स्नातकोत्तर (पीजी) और पीएचडी पाठ्यक्रमों में नामांकन में वृद्धि जारी रही, जबकि स्नातक (यूजी) नामांकन में पिछले वर्ष की तुलना में 2023-24 में लगभग 1 लाख छात्रों की कमी आई. शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी की गई ये रिपोर्ट 2022-23 में 56,180 उच्च शिक्षण संस्थानों और 2023-24 में 64,756 संस्थानों से एकत्र किए गए आंकड़ों पर आधारित हैं.

‘द टेलीग्राफ’ में बसंत कुमार मोहंती की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा में कुल नामांकन 2022-23 के 4.46 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में 4.50 करोड़ हो गया. इसी अवधि के दौरान छात्राओं का नामांकन भी 2.18 करोड़ से बढ़कर 2.24 करोड़ हो गया. सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) — यानी उच्च शिक्षा में नामांकित 18-23 आयु वर्ग का अनुपात — 29.5 से मामूली रूप से सुधरकर 30 हो गया.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सुखदेव थोराट ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत कई प्रावधान स्नातक नामांकन में गिरावट का कारण हो सकते हैं. इनमें स्कूली स्तर पर कौशल (स्किल) शिक्षा पर अधिक जोर, स्नातक स्तर पर कई बार पढ़ाई छोड़ने के विकल्प, चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों की शुरुआत, कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी), उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए सरकारी फंडिंग में कमी और कई छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) योजनाओं का बंद होना शामिल हैं.

थोराट ने कहा, "एनईपी कक्षा 10वीं और 12वीं के बाद छात्रों के एक बड़े हिस्से को व्यावसायिक शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है. सरकार ने कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू कर दी है. स्नातक नामांकन में गिरावट इस नीतिगत बदलाव को दर्शा सकती है."

उन्होंने आगे कहा कि मल्टीपल-एग्जिट (पढ़ाई बीच में छोड़ने) के प्रावधान ने कुछ छात्रों को सर्टिफिकेट या डिप्लोमा प्राप्त करने के बाद डिग्री पाठ्यक्रमों को बीच में ही छोड़ने के लिए प्रेरित किया होगा. थोराट ने यह भी ध्यान दिलाया कि राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा, माध्यमिक शिक्षा के लिए लड़कियों को प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना, बेगम हजरत महल राष्ट्रीय छात्रवृत्ति और मौलाना आजाद राष्ट्रीय फेलोशिप सहित कई छात्रवृत्ति योजनाएं बंद कर दी गई हैं.

उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी फंडिंग में कमी के कारण संस्थानों को फीस बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिससे उच्च शिक्षा कम सस्ती रह गई है, विशेष रूप से सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए. थोराट ने यह भी कहा कि सीयूईटी ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के बीच केंद्रीय विश्वविद्यालयों में होने वाले प्रवेश को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया होगा.

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर फुरकान क़मर ने कहा कि युवाओं की आबादी में कमी आने के कारण स्कूलों में बच्चों का नामांकन घटने लगा है. क़मर ने कहा, "एक अन्य मुद्दा यह है कि स्कूलों से निकलने वाले छात्र निराश महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें उच्च शिक्षा में बहुत अधिक मूल्य (वैल्यू) नहीं दिखाई देता. नौकरी की संभावनाएं भी कम हैं. चूंकि अधिकांश संस्थान निजी क्षेत्र में हैं, जो बहुत अधिक फीस लेते हैं, इसलिए कई परिवार इसका खर्च उठाने में असमर्थ रहते हैं."

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